नयी दिल्ली, छह सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर ने वन अधिकार कानून (एफआरए) और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) कानून (पेसा) के कमजोर क्रियान्वयन पर रविवार को चिंता जताई और कहा कि जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकार कमजोर किए जा रहे हैं तथा ग्राम सभाओं के अधिकारों को दरकिनार किया जा रहा है।
न्यायमूर्ति लोकुर ने यहां आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदायों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के अधिकारों को मान्यता देने और उनकी रक्षा के लिए 2006 में बनाया गया एफआरए लगभग दो दशक बाद भी सही तरीके से लागू नहीं हो पाया है।
उन्होंने कहा, ‘‘आदिवासियों के सामने सबसे बड़ी समस्या कानून का क्रियान्वयन है।’’
उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक सरकार एफआरए के तहत दिए गए अधिकारों को मान्यता देकर लागू नहीं करती, तब तक आदिवासी लोगों के खिलाफ हजारों मामले दर्ज होते रहेंगे।
न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि एफआरए के तहत बड़ी संख्या में दावे किए गए हैं, लेकिन लगभग 20 साल बाद भी कई मामलों में जमीन, लघु वन उपज और आदिवासियों के अन्य अधिकारों पर फैसले लंबित हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘आज भी ये मामले जारी हैं। जमीन के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है, लघु वन उपज के बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है और आदिवासियों के अधिकारों को लेकर भी कोई निर्णय नहीं लिया गया है।’’
न्यायमूर्ति लोकुर ने 1996 में बने पेसा कानून के सही तरीके से लागू नहीं होने का भी मुद्दा उठाया। यह कानून अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था का विस्तार करता है और स्थानीय समुदायों तथा उनके संसाधनों से जुड़े मामलों में ग्राम सभाओं को महत्वपूर्ण भूमिका देता है।
उन्होंने कहा, ‘‘इस कानून को बने 30 साल हो चुके हैं, लेकिन इसे अभी तक सही तरीके से लागू नहीं किया गया है।’’
ओडिशा खनन निगम मामले में उच्चतम न्यायालय के 2013 के फैसले का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि अदालत ने आदिवासी समुदायों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले मामलों में निर्णय लेने के लिए ग्राम सभाओं की भूमिका को स्पष्ट रूप से मान्यता दी थी।
उन्होंने कहा, ‘‘सरकार कहती है कि ‘आपने हमें बता दिया, अब हम फैसला करेंगे’। ग्राम सभा फैसला नहीं करेगी। यह कानून के अनुसार नहीं है। यह एफआरए के अनुसार नहीं है और न ही पेसा के अनुसार है।’’
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि एफआरए और पेसा के कमजोर क्रियान्वयन से जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर आदिवासियों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने आदिवासी समुदायों के लिए रोजगार के बदलते अवसरों पर भी चिंता जताई, खासकर ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम मनरेगा की जगह नए कानून के आने के संबंध में।
न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा कि मनरेगा के लगभग 30 प्रतिशत लाभार्थी आदिवासी समुदाय से आते हैं और उन्होंने ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम की जगह लाए गए नए कानून के प्रभाव को लेकर चिंता जताई।
भाषा शफीक सुरेश
सुरेश