तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के 28 साल हुए, अस्मिता की राजनीति को नया रूप दिया

तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के 28 साल हुए, अस्मिता की राजनीति को नया रूप दिया

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  • Publish Date - January 1, 2026 / 04:46 PM IST,
    Updated On - January 1, 2026 / 04:46 PM IST

(प्रदीप्त तापदार)

कोलकाता, एक जनवरी (भाषा) तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थापना के 28वें वर्ष और एक नए चुनावी चक्र में प्रवेश कर रही है। पार्टी जहां अपनी वैचारिक स्थिति को नए सिरे से गढ़ रही है, वहीं वह बंगाली ‘अस्मिता’ को ‘‘बंगाली हिंदू पहचान’’ की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ जोड़ रही है, ताकि अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को असहज किए बिना हिंदू समर्थन को मजबूत किया जा सके और साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तुष्टीकरण के विमर्श का मुकाबला किया जा सके।

एक जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर वाम मोर्चे के जमे-जमाए शासन को चुनौती देने के उद्देश्य से स्थापित तृणमूल कांग्रेस 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के इर्द-गिर्द जमीनी स्तर पर हुए व्यापक जनआंदोलन के दम पर सत्ता में आई थी।

करीब 15 वर्षों से सत्ता में रहने के बाद पार्टी न सिर्फ इस साल अपना स्थापना दिवस मना रही है बल्कि एक पूरे चुनावी चक्र में प्रवेश कर रही है। 2026 के विधानसभा चुनाव महज तीन महीने दूर हैं और पार्टी एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सामना कर रही है, जहां अस्मिता की राजनीति अधिक तीखी हो चुकी है और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति में भी यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। उन्होंने दक्षिण बंगाल के दीघा में 213 फुट ऊंचे जगन्नाथ मंदिर, कोलकाता में दुर्गा मंदिर और सांस्कृतिक परिसर तथा सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर जैसी कई मंदिर परियोजनाओं के उद्घाटन या निर्माण की घोषणा की है।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने निजी तौर पर स्वीकार किया है कि यह प्रयास भाजपा द्वारा बनर्जी को अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से प्रेरित नेता के रूप में लगातार पेश किए जा रहे आरोपों का जवाब देने के उद्देश्य से किया गया है।

वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा पर तृणमूल कांग्रेस का वोट अंतर लगभग 61 लाख वोट से घटकर 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 42 लाख रह गया, जिससे विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर चिंता बढ़ गई है।

राजनीति विश्लेषक बिश्वनाथ चक्रवर्ती इसे सोच-समझकर बनाई गई लेकिन जोखिम भरी रणनीति बताते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘वह मुसलमानों के खिलाफ खड़े हुए बिना बंगाली हिंदुओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं।’’

एक अन्य विश्लेषक ने कहा कि बंगाल के राजनीतिक विमर्श के भीतर बनर्जी के दृष्टिकोण को ‘‘तेजी से हिंदुत्ववादी के रूप में वर्णित किया जा रहा है।

हिंदू राष्ट्र के विचार को खारिज करते हुए बनर्जी ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘चंडी पाठ’ का पाठ करने से लेकर भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ विधानसभा में तीखी बहस के दौरान अपने ब्राह्मण वंश का हवाला देने तक, अपने व्यक्तिगत विश्वास को अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा है, जबकि वह ईद और क्रिसमस समारोहों में भाग लेना जारी रखती हैं।

तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व इस वैचारिक झुकाव को खारिज करता है। वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने ‘‘नरम हिंदुत्व’’ के आरोप को नकारते हुए जोर देकर कहा कि पार्टी दृढ़ता से धर्मनिरपेक्ष बनी हुई है। रॉय ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘तृणमूल कांग्रेस नरम हिंदुत्व की ओर नहीं बढ़ी है। सभी समुदायों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने का मतलब धर्मनिरपेक्षता का त्याग करना नहीं है।’’

भाषा सुरभि रंजन

रंजन