हौसले ने दिखाई राह: झारखंड के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने नापीं हिमालय की ऊंचाइयां

हौसले ने दिखाई राह: झारखंड के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने नापीं हिमालय की ऊंचाइयां

हौसले ने दिखाई राह: झारखंड के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने नापीं हिमालय की ऊंचाइयां
Modified Date: September 6, 2026 / 05:27 pm IST
Published Date: September 6, 2026 5:27 pm IST

रांची, छह सितंबर (भाषा) झारखंड के दूरदराज के गांवों के निवासी दो दृष्टिबाधित युवाओं ने हिमालय की ऊंचाइयों को चुनौती देते हुए अपनी हिम्मत और जज्बे की मिसाल पेश की है और इनमें से एक ने 20,000 फुट से अधिक ऊंची चोटी फतह की, जबकि दूसरा 16,732 फुट की ऊंचाई पर स्थित आधार शिविर तक पहुंचा।

टोडानहातू गांव के शेखर गोप (24) और धीरज कुम्हार (23) ने 25 से 31 अगस्त के बीच लद्दाख की मारखा घाटी में 20,472 फुट ऊंची झो जोंगो चोटी पर चढ़ाई के अभियान में हिस्सा लिया। गोप चोटी तक पहुंचने में सफल रहे, जबकि स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण कुम्हार को 16,732 फुट की ऊंचाई पर अपनी चढ़ाई रोकनी पड़ी।

उनकी यह उपलब्धि उस सफर का मुकाम है, जिसकी शुरुआत टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘सबल’ पहल के तहत ब्रेल सीखने और बिना किसी की मदद के आने-जाने का प्रशिक्षण लेने से हुई थी।

इन युवाओं का एकमात्र शौक केवल पर्वतारोहण नहीं है। दोनों फुटबॉल खिलाड़ी भी हैं। गोप झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम के कप्तान हैं और धीरज दृष्टिबाधित फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

फाउंडेशन के एक प्रतिनिधि ने कहा, ‘‘दोनों युवक जन्म से ही पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित हैं। उनके पास अपने शुरुआती जीवन में ऐसे संसाधन बहुत कम थे, जो उन्हें आत्मनिर्भर बना सकें। यहां तक कि सफेद छड़ी जैसी बुनियादी चीज भी उन्हें आसानी से उपलब्ध नहीं थी।’’

इस कारण उन्हें रोजमर्रा के वे काम भी दूसरों की मदद से करने पड़ते थे, जिन्हें आमतौर पर लोग सहजता से कर लेते हैं।

वर्ष 2022 में फाउंडेशन की दिव्यांग समावेशन पहल ‘सबल’ से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बदलाव आने लगा। समुदाय की भागीदारी वाली इस पहल के तहत प्रशिक्षण और सहयोग के जरिये उन्होंने ब्रेल लिपि सीखी, रोजमर्रा के काम खुद करना सीखा, स्वतंत्र रूप से आना-जाना शुरू किया और डिजिटल प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का कौशल सीखा।

फाउंडेशन ने कहा, ‘‘कौशल हासिल करने से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता में बदल गया।’’

उनके इस सफर ने तुमुंग में एक नया मोड़ लिया, जहां उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता, टीम भावना और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए खुले वातावरण में आयोजित अनुभव आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।

दोनों युवाओं के लिए यह अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर अपने भीतर छिपी नयी संभावनाओं को तलाशने का अवसर था। इसी अनुभव ने उनमें खेल और नेतृत्व के प्रति रुचि पैदा की।

झो जोंगो चोटी की चढ़ाई के लिए चुने जाने के बाद दोनों दृष्टिबाधित पर्वतारोहियों ने कड़ी तैयारी की। दलमा पहाड़ियों में अभियान-पूर्व प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने अपनी शारीरिक क्षमता, सहनशक्ति और मानसिक मजबूती बढ़ाई।

जब वे लद्दाख पहुंचे ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन, कड़ाके की ठंड और दुर्गम रास्ते हर कदम पर उनकी सहनशक्ति की परीक्षा ले रहे थे लेकिन न ऊंचाई और न ही मुश्किल हालात उनके हौसले को डिगा सके।

वर्षों के संघर्ष और अपने सफर के हर पड़ाव पर हासिल आत्मविश्वास के दम पर पर दोनों कठिन भूभाग और अत्यधिक ऊंचाई वाली परिस्थितियों का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहे।

अभियान के दौरान कुम्हार की तबीयत बिगड़ने लगी, जिसके कारण उन्हें 16,732 फुट ऊंचाई पर स्थित आधार शिविर में ही रुकना पड़ा। गोप ने हालांकि दृढ़ संकल्प के साथ चढ़ाई जारी रखी और सफलतापूर्वक चोटी तक पहुंच गए।

दोनों अपनी इस उपलब्धि का श्रेय ‘सबल’ को देते हैं।

भाषा सिम्मी सुरेश

सुरेश


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