जयपुर, एक सितंबर (भाषा) राजस्थान के बाड़मेर की दो युवतियों ने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के पारंपरिक रास्ते से आगे बढ़ते हुए अब राजनीति का रुख किया है। अलीशा देव और खुशबू आचार्य बाड़मेर नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार चुनाव मैदान में उतर रही हैं।
युवतियों का कहना है कि राजनीति के जरिए वे लोगों की सेवा के अपने लक्ष्य को आगे बढ़ाना चाहती हैं।
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा की तैयारी कर रहीं 24 वर्षीय अलीशा को वार्ड संख्या 25 से, जबकि राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) की परीक्षा दे चुकीं 25 वर्षीय खुशबू आचार्य को वार्ड संख्या सात से कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया है।
अलीशा के लिए राजनीति लोगों की समस्याओं को करीब से समझने और उनके समाधान के लिए जमीनी स्तर पर काम करने का अवसर है।
उन्होंने कहा, “राजनीति भी जनसेवा है। पार्टी ने मुझे मौका दिया है। मैं पहली बार चुनाव लड़ रही हूं और भरोसा है कि मैं चुनाव जरूर जीतूंगी।”
उन्होंने कहा, “मेरी प्राथमिकता घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करना और उनकी समस्याओं को जानना होगी, ताकि जिन समस्याओं का समाधान मेरे स्तर पर संभव हो, उन्हें दूर किया जा सके।”
अलीशा के पिता एक विद्यालय में उपप्रधानाचार्य हैं, जबकि उनके चाचा नरेश देव सारण कांग्रेस के टिकट पर दो बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। इनमें वह एक चुनाव जीतने में सफल रहे थे।
खुशबू का परिवार भी स्थानीय राजनीति से जुड़ा रहा है। उनके पिता पार्षद रह चुके हैं और मोटर पार्ट्स का कारोबार करते हैं।
खुशबू ने कहा, “मैं कांग्रेस पार्टी की बहुत आभारी हूं कि उसने मुझे समर्थन दिया। मुझे नहीं लगता कि कोई बड़ी मुश्किल आएगी। हम कांग्रेस को जिताने के लिए पूरी मेहनत करेंगे।”
उन्होंने कहा कि वह अपने वार्ड के लोगों के लिए काम करना चाहती हैं और उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करेंगी।
खुशबू ने कहा, “मेरे पिता पार्षद रह चुके हैं। लोग हमारे साथ हैं। हम पहले से बेहतर काम करने की कोशिश करेंगे।”
उन्होंने कहा, “युवाओं को राजनीति में आना चाहिए। लोकतंत्र में सुधार के लिए लोकतंत्र से जुड़ना जरूरी है। केवल मेरा वोट देना ही कोई बदलाव नहीं लाएगा।”
अलीशा और खुशबू की उम्मीदवारी ने नगर परिषद चुनाव में युवा चेहरों को जगह दी है।
इन युवतियों के लिए हालांकि यह चुनाव महज पार्टी का टिकट हासिल करने का मामला नहीं है। यह उनके लिए पहली बार यह परखने का मौका भी है कि लोगों की सेवा करने की उनकी आकांक्षा परीक्षा केंद्रों और किताबों से निकलकर वास्तविक चुनावी राजनीति में कितनी कारगर साबित होती है।
भाषा बाकोलिया मनीषा खारी
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