नयी दिल्ली, आठ सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में मुकदमे लंबे समय तक लंबित रहने का इतिहास रहा है, खासकर अक्सर “बेवजह” बहुत ज्यादा सबूतों की वजह से।
नयायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और नयायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 1993 में दर्ज भ्रष्टाचार के एक मामले में एक व्यक्ति को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। बाद में इस मामले को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया था।
पीठ ने कहा, “हम इस तथ्य पर ध्यान दिए बिना नहीं रह सकते कि भ्रष्टाचार के मामलों में बड़ी मात्रा में साक्ष्य पेश किए जाते हैं, जो अक्सर अदालत के लिए भयावह होते हैं। खासकर तब, जब साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने वाले कई पहलू आरोपों की पुष्टि करने या आरोपी लोक सेवक का अपराध साबित करने में बिल्कुल भी सहायक नहीं होते।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) के तहत आर्थिक लाभ के बिना दोषसिद्धि नहीं हो सकती।
पीठ ने कहा, “आर्थिक लाभ के अभाव में धारा 13(1)(डी) के तहत दोषसिद्धि नहीं हो सकती। मौजूदा मामले में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से पाया है कि ऐसा कोई आर्थिक लाभ हुआ ही नहीं था।”
न्यायालय ने एक व्यक्ति की अपील पर अपना फैसला सुनाया, जिसमें उसने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मई 2018 के दोषी ठहराने वाले आदेश को चुनौती दी थी।
पीठ ने कहा, “भ्रष्टाचार के मामलों में मुकदमे लंबे समय तक लंबित रहते हैं, खासकर इसलिए क्योंकि इनमें बहुत ज्यादा सबूत पेश किए जाते हैं, जो अक्सर गैर-जरूरी और जैसा कि हमने देखा, ज्यादातर अप्रासंगिक होते हैं।”
इसमें बताया गया कि इस मामले में जांच असम के पशु चिकित्सा विभाग से मिली एक शिकायत के आधार पर शुरू की गई थी। शिकायत में कहा गया था कि दवाइयों की आपूर्ति के लिए नकली आरसीसी बिल जमा करके 5,97,200 रुपये का नुकसान पहुंचाया गया; दवाइयों की कभी आपूर्ति नहीं की गईं, लेकिन एक फर्जी फर्म को भुगतान कर दिया गया।
पीठ ने बताया कि सात लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया था, जिनमें से चार को अधीनस्थ अदालत ने दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी और तीन को बरी कर दिया था।
पीठ ने कहा कि दोषी ठहराए गए तीन लोगों ने उच्च न्यायालय में अपील की, जिसमें से एक को बरी कर दिया गया, जबकि बाकी दो को भादंसं की धारा 120-B (आपराधिक साजिश) के साथ मिलाकर अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत दोषी ठहराया गया।
न्यायालय ने कहा, “जब विभाग से इतनी बड़ी रकम जारी की गई थी, तो उस पैसे के लेन-देन का पता लगाने के लिए कोई जांच होती नहीं दिखी।”
न्यायालय ने कहा कि जिस प्रावधान के तहत उच्च न्यायालय ने अपील करने वाले को दोषी ठहराया था, उसके आधार पर उस दोषसिद्धि को बरकरार रखने का कोई कारण नहीं था।
याचिका स्वीकार करते हुए पीठ ने कहा, “अतः अपीलकर्ता को बरी किया जाता है। यदि वह हिरासत में है, तो किसी अन्य मामले में उसकी आवश्यकता न होने पर उसे तत्काल रिहा किया जाए। यदि वह पहले से जमानत पर है, तो उसके जमानत बांड रद्द माने जाएंगे।”
भाषा प्रशांत नरेश
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