‘नफरत भरे विमर्श के मूल स्रोत से मिलना, शिकायत करना चाहते थे’: पूर्व सीईसी कुरैशी

‘नफरत भरे विमर्श के मूल स्रोत से मिलना, शिकायत करना चाहते थे’: पूर्व सीईसी कुरैशी

‘नफरत भरे विमर्श के मूल स्रोत से मिलना, शिकायत करना चाहते थे’: पूर्व सीईसी कुरैशी
Modified Date: July 15, 2026 / 06:40 pm IST
Published Date: July 15, 2026 6:40 pm IST

नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत से 2022 में मुलाकात करने वाले प्रतिष्ठित मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा रहे पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) एस. वाई. कुरैशी ने कहा कि उस बैठक का उद्देश्य ‘नफरत भरे विमर्श के मूल स्रोत’ तक पहुंचकर अपनी शिकायत दर्ज कराना था।

अपनी नयी पुस्तक ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज, नॉट ए मेमॉयर’ को जारी किए जाने से पहले ‘पीटीआई वीडियो’ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में कुरैशी ने मोहन भागवत के साथ हुई उस बैठक को याद किया, जिसमें उनके साथ दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, पत्रकार शाहिद सिद्दीकी, होटल व्यवसायी सईद शेरवानी और सेना के पूर्व उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) जमीर उद्दीन शाह भी थे।

कुरैशी ने 22 अगस्त, 2022 को हुई बैठक के दौरान कहा था कि भागवत ने उनसे कहा था कि ‘‘हम मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र की कल्पना भी नहीं कर सकते’’।

जब उनसे कुछ वर्गों की ओर से की गई उस आलोचना के बारे में पूछा गया कि वे मुसलमानों से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार के पास जाने के बजाय एक सांस्कृतिक संगठन आरएसएस के पास क्यों गए, तो कुरैशी ने कहा, ‘‘हमने यह आलोचना कई बार सुनी है। हम निश्चित रूप से सरकार के साथ भी वार्ता करना चाहते थे। लेकिन हमने सोचा कि हम इस नफरत भरे विमर्श के मूल स्रोत तक जायेंगे। हमारे अनुसार, नफरत का यह पूरा विमर्श आरएसएस द्वारा फैलाया जा रहा था।’’

तीस जुलाई, 2010 से 10 जून, 2012 तक देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे कुरैशी ने कहा, ‘‘इसलिए हमने सोचा कि हम संगठन के प्रमुख व्यक्ति के पास जायें और उनसे कहें कि आप जानते हैं, देश में जो ‘लिंचिंग (भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या करना)’, नफरत भरे भाषण और ध्रुवीकरण की घटनाएं हो रही हैं, इनसे देश का माहौल खराब हो रहा है। यह स्थिति बहुत दुखद है, इसलिए हमें उनसे इसकी शिकायत करनी चाहिए।’’

कुरैशी ने कहा, ‘‘उन्होंने (भागवत) हमें आमंत्रित नहीं किया था। हमने उनसे मिलने का समय मांगा था। उन्होंने उदारता दिखाते हुए दिल्ली में दो-तीन सप्ताह के भीतर हमें मिलने का समय दे दिया। और फिर हमने शिकायत करते हुए कहा, ‘देखिए, जो कुछ हो रहा है वह ठीक नहीं है और आपके हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों का भविष्य आपको कैसा दिखाई देता है?’ तो उन्होंने (भागवत) यह बात बिल्कुल स्पष्ट कर दी कि ‘हमारे पास हमेशा से हिंदू राष्ट्र था, अब भी है और हमेशा रहेगा’।’’

कुरैशी ने कहा कि भागवत ने भी बदले में प्रतिनिधिमंडल से शिकायत की कि हिंदुओं को गोहत्या और लोगों द्वारा ‘गौमांस’ खाना पसंद नहीं है, साथ ही मुसलमानों द्वारा उन्हें ‘‘काफिर’’ कहे जाने पर भी आपत्ति है।

उन्होंने कहा, ‘‘उन्होंने (भागवत) केवल यही शिकायतें की थीं। इसलिए हमारा जवाब था कि ‘आपने पहले ही दो-तीन राज्यों को छोड़कर देश में गोहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया है। पूरे देश में इस प्रतिबंध को लागू करें। यह आपके ऊपर निर्भर है। आप सरकार चला रहे हैं। सरकार से कहिए कि इसे लागू करे’…. दूसरी बात, हमने यह समझाने की कोशिश की कि ‘काफिर’ कोई गाली नहीं है। यह अरबी भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है ‘अविश्वासी’।’’

कुरैशी ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने भागवत से कहा कि यदि हिंदुओं को लगता है कि यह एक अपमानजनक शब्द है, तो मुसलमानों को इससे बचना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘हम इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे और दूसरों से भी इसका इस्तेमाल न करने के लिए कहेंगे। और अपनी जवाबी शिकायत में हमने कहा कि ‘आप भी जरा-सी बात पर हमें पाकिस्तानी और जिहादी कह देते हैं। हमें भी यह पसंद नहीं है’। तो उन्होंने सहमति जताई कि यह बिल्कुल गलत है और ‘हमें अपने लोगों से ऐसा न करने के लिए कहना चाहिए’।’’

कुरैशी ने कहा कि यह एक बहुत ही सकारात्मक चर्चा थी।

कुरैशी ने अपनी पुस्तक में इस घटना का उल्लेख ‘जब हम भागवत से मिले’ शीर्षक के अंतर्गत किया है।

उन्होंने पुस्तक में कहा, ‘‘जब यह बैठक सार्वजनिक हुई, तो इसकी प्रतिक्रियाएं ज्यादातर सकारात्मक थीं, हालांकि कुछ लोगों ने हम पर आरएसएस को ‘मान्यता प्रदान करने’ का आरोप लगाया। लेकिन उन्हें हमारी मान्यता की शायद ही जरूरत है; वे पहले से ही शक्तिशाली हैं। हम तो केवल अपने देश को लेकर चिंतित सेवानिवृत्त नागरिक हैं।’’

कुरैशी ने कहा, ‘‘इसके बाद हमारी तीन बैठकें हो चुकी हैं। हर बार वह वही बातें दोहराते हैं जो उन्होंने हमसे कही थीं: कि संविधान सर्वोपरि है, मुसलमान भारत के ही हैं, और एक सदी से अधिक समय से चले आ रहे हिंदू-मुस्लिम तनाव को रातोंरात समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए सभी पक्षों को धैर्य रखना होगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमारा निष्कर्ष बहुत सरल है: बातचीत करने से हम लोग कुछ खोते नहीं है बल्कि इससे बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। चुप्पी दूरी और विभाजन पैदा करती है। संवाद, चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, फिर भी आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है।’’

भाषा

देवेंद्र माधव

माधव


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