Supreme Court on Election Eligibility: अब ये लोग नहीं लड़ पाएंगे चुनाव! इस वजह से सख्त हुआ सुप्रीम कोर्ट, कहा- अब देश बदल रहा है..

अब ये लोग नहीं लड़ पाएंगे चुनाव! इस वजह से सख्त हुआ सुप्रीम कोर्ट, Supreme Court on Election Eligibility

Supreme Court on Election Eligibility: अब ये लोग नहीं लड़ पाएंगे चुनाव! इस वजह से सख्त हुआ सुप्रीम कोर्ट, कहा- अब देश बदल रहा है..
Modified Date: July 15, 2026 / 06:52 pm IST
Published Date: July 15, 2026 6:51 pm IST

नई दिल्ली। Supreme Court on Election Eligibility पंचायत और अन्य स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए लागू दो बच्चों की शर्त की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से बनाई गई यह नीति बदलते जनसांख्यिकीय हालात में शायद अपना उद्देश्य पूरा कर चुकी है और अब इसकी प्रासंगिकता की समीक्षा की आवश्यकता है।

Supreme Court on Election Eligibility जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ महाराष्ट्र के एक सरपंच द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता को तीसरा बच्चा होने के कारण स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिए कि वह राज्यों में लागू ऐसे प्रावधानों के पीछे के व्यापक औचित्य की जांच करने को तैयार है। अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे को मामले में एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) के रूप में सहयोग करने को कहा है। सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने वर्ष 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि उस फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत हो सकती है। उस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए दो बच्चों की शर्त को संवैधानिक रूप से वैध माना था।

पीठ ने कहा कि पिछले दो दशकों में देश की जनसंख्या संबंधी स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। अदालत के अनुसार, भारत का कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) अब लगभग 1.7 रह गया है, जबकि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह कई विकसित देशों से भी कम है। ऐसे में जनसंख्या वृद्धि रोकने के उद्देश्य से बनाई गई नीति को पहले की तरह लागू रखना उचित है या नहीं, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि वर्तमान परिस्थितियों में इस नीति को जारी रखना कानूनी रूप से भी सवालों के घेरे में आ सकता है। पीठ ने यह भी कहा कि कई राज्यों में अब चुनौती बढ़ती नहीं, बल्कि घटती प्रजनन दर है। ऐसे में पुरानी नीति का औचित्य कमजोर पड़ता दिखाई देता है।

जस्टिस नरसिम्हा ने यह भी कहा कि आज के समय में तीन बच्चों का होना असामान्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने टिप्पणी की कि इस नीति का प्रभाव अब समाप्त हो चुका है और विरोधी उम्मीदवार कई बार इसे चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस नीति के औचित्य और वर्तमान समय में इसकी आवश्यकता को लेकर गंभीरता से विचार करेगी।

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