नोएडा, 20 सितंबर (भाषा) गाजियाबाद के हिंडन हवाई अड्डे से नोएडा के सेक्टर-62 स्थित फोर्टिस अस्पताल तक करीब 20 किलोमीटर का सफर आम दिनों में वाहनों की भीड़भाड़ के बीच बहुत लंबा हो सकता है लेकिन चंडीगढ़ की एक महिला द्वारा दान किया गया हृदय लेकर आ रही एंबुलेंस ने इस दूरी को महज 16 मिनट में पूरा किया।
यातायात पुलिस ने ग्रीन कॉरिडोर बनाकर रास्ते में वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित किया, जिसे हृदय को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सका और 62 वर्षीय मरीज का सफल प्रतिरोपण हुआ।
अधिकारियों ने बताया कि चंडीगढ़ की एक महिला के दान किए गए इस हृदय को पहले एयर एंबुलेंस के जरिए हिंडन हवाई अड्डे लाया गया। इसके बाद इसे सड़क मार्ग से सेक्टर-62 स्थित फोर्टिस अस्पताल पहुंचाया गया, जहां एक मरीज में हृदय का सफल प्रतिरोपण किया गया।
नोएडा के पुलिस उपायुक्त (यातायात) अभय कुमार मिश्रा ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि नौ सितंबर को गाजियाबाद से नोएडा के सेक्टर-62 तक ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया था। इस मार्ग पर यातायात को नियंत्रित किया गया, ताकि एंबुलेंस के रास्ते में कम से कम रुकावट आए।
मिश्रा ने कहा, ‘‘गाजियाबाद से नोएडा सेक्टर-62 तक करीब 20 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया था। दोपहर दो बजे हिंडन हवाई अड्डे से हृदय को एंबुलेंस के जरिए ले जाया गया और सड़क मार्ग से 16 मिनट में सेक्टर-62 स्थित फोर्टिस अस्पताल पहुंचाया गया।’’
यह घटना ग्रीन कॉरिडोर के उद्देश्य को स्पष्ट करती है। इसके तहत कुछ समय के लिए यातायात को इस तरह नियंत्रित और व्यवस्थित किया जाता है कि किसी अंग या गंभीर रूप से बीमार मरीज को ले जा रही एंबुलेंस शहर से होकर बिना अनावश्यक देरी के गुजर सके।
अंग प्रतिरोपण के मामलों में इसकी अहमियत और बढ़ जाती है, क्योंकि दानदाता के शरीर से बाहर निकाले जाने के बाद किसी अंग के सुरक्षित रहने की अवधि सीमित होती है।
हालांकि, नौ सितंबर की यह घटना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में इस तरह का पहला मामला नहीं है। नोएडा, गाजियाबाद, दिल्ली और आसपास के शहरों में पिछले कुछ वर्षों में कई बार इस तरह के ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए हैं। इससे आपात स्थिति में अस्पताल तक अंगों या गंभीर मरीजों को कम से कम समय में पहुंचाने के लिए यातायात को नियंत्रित करना अब एक नियमित व्यवस्था बनती जा रही है।
पिछले साल अगस्त में नोएडा यातायात पुलिस ने डीएनडी फ्लाईवे से सेक्टर-30 स्थित चाइल्ड पीजीआई तक छह किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर बनाया था। इसका उद्देश्य समय से पहले जन्मे जुड़वां बच्चों को अस्पताल पहुंचाना था। अधिकारियों ने बताया कि एंबुलेंस करीब चार मिनट में अस्पताल पहुंच गई थी।
चाइल्ड पीजीआई के अधिकारियों के अनुसार, एक लड़का और एक लड़की का जन्म दिल्ली के नजफगढ़ स्थित एक निजी अस्पताल में 26 सप्ताह की गर्भावस्था के बाद हुआ था। दोनों का वजन करीब 700-700 ग्राम था। वे गहन चिकित्सा देखभाल में थे और उन्हें सांस लेने तथा पाचन तंत्र से जुड़ी गंभीर जटिलताएं थीं।
दो जून 2025 को नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली के अधिकारियों ने यशोदा अस्पताल से फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल तक 17 किलोमीटर लंबे ग्रीन कॉरिडोर के लिए समन्वय किया था। इसके जरिए जीवित दाता से प्राप्त हृदय को 19 मिनट में अस्पताल पहुंचाया गया था।
आठ जनवरी 2025 को नोएडा और फरीदाबाद पुलिस ने फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल से ग्रेटर नोएडा के यथार्थ अस्पताल तक 46.4 किलोमीटर लंबे ग्रीन कॉरिडोर के लिए समन्वय किया था। इसके जरिए एक किडनी को ले जाया गया और यह दूरी 24 मिनट 40 सेकंड में तय की गई।
क्षेत्र में ऐसे ग्रीन कॉरिडोर का इस्तेमाल इन हालिया मामलों से भी पुराना है।
एक अक्टूबर 2021 को यातायात पुलिस ने दिल्ली-नोएडा चिल्ला सीमा से सेक्टर-128 स्थित जेपी अस्पताल तक 14 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर बनाया था। इसके जरिए एक अंग को ले जा रही एंबुलेंस ने यह दूरी 14 मिनट में तय की थी। उसी दिन सेक्टर-14ए से जेपी अस्पताल के बीच अंग प्रतिरोपण से जुड़ी एक अन्य आपात स्थिति के लिए भी अलग ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया था।
स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए ग्रीन कॉरिडोर का महत्व केवल बेहद कम समय में दूरी तय करने तक सीमित नहीं है। इसका मकसद उस समय अनावश्यक देरी को दूर करना है, जब चिकित्सा के लिहाज से हर गुजरता मिनट पहले ही महत्वपूर्ण हो चुका होता है।
यशोदा ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक डॉ. पी. एन. अरोड़ा ने कहा कि जब हर मिनट महत्वपूर्ण हो, खासकर अंगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने और ऐसी अन्य आपात स्थितियों में जहां समय बेहद अहम होता है, तो ग्रीन कॉरिडोर बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं।
शारदाकेयर-हेल्थसिटी के हृदय रोग विभाग के वरिष्ठ निदेशक एवं प्रमुख डॉ. अखिल के. रुस्तगी ने कहा कि हृदय रोग के मामलों में ग्रीन कॉरिडोर विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि गंभीर आपात स्थितियों में देरी का उपचार के नतीजों पर असर पड़ सकता है।
भाषा गोला रंजन
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