आपराधिक मामले में बरी होने पर क्या ईडी नहीं चला सकती मुकदमा, शीर्ष अदालत करेगी इस प्रश्न की पड़ताल
आपराधिक मामले में बरी होने पर क्या ईडी नहीं चला सकती मुकदमा, शीर्ष अदालत करेगी इस प्रश्न की पड़ताल
नयी दिल्ली, तीन फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने देश भर में सैकड़ों मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की गई अभियोजन कार्रवाई को प्रभावित करने वाले व्यापक कानूनी प्रश्न की पड़ताल करने पर मंगलवार को सहमति व्यक्त की।
इसके तहत क्या किसी आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति के बरी होने का मतलब यह होगा कि आरोपी पर धनशोधन के अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शिकायत की कि जब मूल अपराध में “बड़े और प्रभावशाली लोग” शामिल होते हैं, तो अलग-अलग राज्यों की पुलिस ढिलाई बरतती है। ऐसे मामलों में आरोपियों के बरी हो जाने से धनशोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्रवाई नहीं हो पा रही है। इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है मानो ईडी को पूरी तरह से बाहर ही कर दिया गया हो।
पीएमएलए के तहत मूल अपराध (या अनुसूचित अपराध) वह अपराध है जिससे ‘‘अपराध की आय’’ उत्पन्न होती है, जो ईडी द्वारा मामले की जांच शुरू करने के लिए एक पूर्व शर्त है।
न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विजय मदनलाल चौधरी मामले के 2022 के फैसले पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘कई उलझनों को सुलझाना बाकी है।’’ इस फैसले में ईडी की गिरफ्तारी, तलाशी और ज़ब्ती की शक्तियों को बरकरार रखा गया था।
पीठ ने कहा कि इस निष्कर्ष से सहमत होना मुश्किल है कि अगर मूल अपराध रद्द कर दिया जाए, तो धनशोधन का मामला अपने आप खत्म हो जाएगा।
इसने कहा, “ईडी का मामला मूल अपराध पर क्यों निर्भर करता है? हर मामले के अपने तथ्य होते हैं और वे एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हो सकते। ईडी मूल अपराध का बचाव करने के लिए अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं है। यह हमारी समझ से परे है। ये गंभीर आर्थिक अपराध हैं।”
ईडी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने कहा कि 2022 के फैसले की कई लोगों ने अलग-अलग तरह से व्याख्या की है और उन्होंने धनशोधन के मामलों में अभियोजन के दौरान उन्हें हो रही कठिनाइयों की ओर इशारा किया।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने पवना दिब्बुर बनाम प्रवर्तन निदेशालय के 2023 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निर्णय में यह निष्कर्ष कि धनशोधन के अपराध के लिए यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी अनुसूचित अपराध में भी आरोपी हो, संदिग्ध है व अदालत इसकी भी पड़ताल करेगी।
कई उदाहरण देते हुए पीठ ने कहा कि किसी मूल अपराध में आरोपी को बरी कर दिए जाने या रिहा कर दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि अपराध हुआ ही नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, “यदि 2022 के फैसले के अनुसार ईडी के हाथ बंधे रहेंगे, तो वह धनशोधन के मामलों में कार्रवाई कैसे करेगी? इससे कानून बनाने का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। हम रोज़ ऐसे मामलों से निपट रहे हैं।”
यह पीठ कई ऐसी याचिकाओं की सुनवाई कर रही है जिनमें आरोपियों ने धनशोधन के मामलों में अपनी रिहाई की इस आधार पर की मांग की है कि उन्हें मूल या अनुसूचित अपराध में बरी कर दिया गया है और इसलिए, अपराध से अर्जित कोई आय नहीं थी।
पीठ ने कहा, ‘‘अगर ऐसा होता है, तो किसी मूल अपराध में बरी होने के बाद ईडी की पूरी कार्यवाही निरर्थक हो जाएगी।’’ इसने यह भी कहा कि वह कानूनी प्रश्न की पड़ताल करेगी और 2022 और 2023 के फैसलों में दिए गए निष्कर्ष की वैधता पर विचार करेगी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह व्यापक प्रश्न की जांच के लिए अप्रैल में दोनों पक्षों को सुनेगा।
इसने कहा, ‘‘यदि आवश्यक हुआ तो हम इसे तीन न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के पास भेजेंगे क्योंकि 2022 का फैसला भी तीन न्यायाधीशों की पीठ का था।’’
इसने राजू से यह सवाल किया कि ईडी ने विजय मदनलाल चौधरी मामले में 2022 के फैसले की समीक्षा के लिए याचिका अब तक क्यों नहीं दायर की है।
भाषा नोमान नेत्रपाल
नेत्रपाल

Facebook


