वरिष्ठों से प्रशिक्षण के बिना नहीं सीख पाएंगे पेशे की बारीकियां : न्यायालय ने युवा वकीलों से कहा

वरिष्ठों से प्रशिक्षण के बिना नहीं सीख पाएंगे पेशे की बारीकियां : न्यायालय ने युवा वकीलों से कहा

वरिष्ठों से प्रशिक्षण के बिना नहीं सीख पाएंगे पेशे की बारीकियां : न्यायालय ने युवा वकीलों से कहा
Modified Date: September 18, 2026 / 07:44 pm IST
Published Date: September 18, 2026 7:44 pm IST

नयी दिल्ली, 18 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को बार के युवा सदस्यों को सलाह दी कि जब तक वे वरिष्ठ वकीलों से प्रशिक्षण नहीं लेंगे, तब तक उन्हें इस पेशे की बारीकियों का पता नहीं चलेगा।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि बार के युवा सदस्यों को यह पता होना चाहिए कि अदालत में क्या बोलना है और क्या नहीं।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘आज मुझे पता चला है कि कुछ युवा बिना किसी प्रशिक्षण के सीधे अपना ऑफिस शुरू कर रहे हैं। यह बिल्कुल भी अच्छी बात नहीं है। जब तक आप वरिष्ठ वकीलों से प्रशिक्षण नहीं लेंगे, तब तक आप वकालत के असली हुनर ​​और इस पेशे की असली बारीकियों को नहीं जान पाएंगे।’’

पीठ ने यह बात मुंबई उच्च न्यायालय के एक आदेश से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान कही।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि बार के युवा सदस्यों को वरिष्ठ वकीलों के पास जाना चाहिए, जो उन्हें गाइड करेंगे।

उन्होंने कहा, ‘‘हम जानते हैं कि आजकल के युवा बहुत महत्वाकांक्षी हैं, लेकिन जब तक आप वरिष्ठ वकीलों से प्रशिक्षण नहीं लेते, तब तक आप इस पेशे की बारीकियों को नहीं समझ पाएंगे। पीढ़ियों से यही होता आ रहा है। इस नेक पेशे की बारीकियां और अच्छे तौर-तरीके एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपी जाती रही हैं।’’

पीठ ने इस बात का संज्ञान लिया कि युवा वकील डिग्रियां हासिल कर रहे हैं और जल्द ही अपना कार्यालय भी शुरू कर रहे हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘लेकिन व्यावहारिक कौशल कहां हैं? आपके पास भले ही ज़रूरी योग्यता हो, लेकिन व्यावहारिक कौशल तो रोज विकसित करना पड़ता है। आपको किसी वरिष्ठ से सीखना होगा या अदालत में बैठकर चीज़ों को देखना-समझना होगा।’’

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि अदालती कार्यवाही देखकर युवा वकील यह जान पाएंगे कि उन्हें कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए।

एक वकील के तौर पर अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘देखिए, पहले हम सभी अपने वरिष्ठ वकीलों से प्रशिक्षण लेते थे, फिर हम अपना कार्यालय शुरू करते थे और फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ते थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जब हम युवा थे, तो कभी-कभार ही कोई मामला या मेनशनिंग होता था। तब हम किसी अदालत कक्ष में जाकर बैठते थे, खासकर सख्त न्यायाधीशों के सामने, ताकि हम उस सख्ती के आदी हो सकें; क्योंकि अगली बार जब आपका वहां कोई मुकदमा होता, तो न्यायाधीश को देखकर आप पहले ही समझ चुके होते थे कि कैसे जवाब देना है और क्या कहना है।’’

भाषा

सुरेश दिलीप

दिलीप


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