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बंदूक से राखी तक : छत्तीसगढ़ के पुनर्वास केंद्र में पूर्व माओवादी सीख रहे हुनर

बंदूक से राखी तक : छत्तीसगढ़ के पुनर्वास केंद्र में पूर्व माओवादी सीख रहे हुनर

बंदूक से राखी तक : छत्तीसगढ़ के पुनर्वास केंद्र में पूर्व माओवादी सीख रहे हुनर
Bhasha
Published: 27 Aug 2026 | 3:01 pmModified: 27 Aug 2026 | 3:01 pm

कांकेर, 27 अगस्त (भाषा) छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में आत्मसमर्णण करने वाले माओवादियों की उंगलियां अब बंदूक के ट्रिगर पर नहीं बल्कि रेशम की डोर और मोतियों पर हैं जिससे वह सुंदर राखियां तैयार कर रहे हैं।

कांकेर जिले के चौगेल (मुल्ला) गांव में एक सुरक्षा शिविर के भीतर बने पुनर्वास केंद्र में, पूर्व नक्सलियों ने त्योहार से पहले एक हजार से अधिक राखियां तैयार कर ली हैं, जो शुक्रवार को भाइयों की कलाइयों पर सजेंगी।

कांकेर जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित यह केंद्र एक ऐसी जगह बन गया है जहां पूर्व माओवादी सदस्य ऐसे हुनर सीख रहे हैं जो हिंसा का रास्ता छोड़ने के बाद उन्हें रोजी-रोटी कमाने में मदद कर सकते हैं।

अधिकारियों ने बताया कि पुनर्वास केंद्र में रह रहे पुरुषों और महिलाओं ने मिलकर यह राखियां बनाई हैं और इन्हें बाजार में बेचा भी गया है, जिससे प्रशिक्षण लेने वालों को अपने काम से कमाई करने का मौका मिला है।

कांकेर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आकाश श्रीश्रीमाल ने कहा, ‘‘पुनर्वास केंद्र में रहने वाले पूर्व माओवादियों के लिए कई गतिविधियां चलाई जा रही हैं। इस साल होली के दौरान, उन्होंने गुलाल और रंग तैयार किए थे, और अब रक्षाबंधन के लिए उन्होंने एक हजार से अधिक राखियां बनाई हैं।’’

उन्होंने कहा कि इसका मकसद आत्मसमर्पण करने वालों को रचनात्मक और कमाई वाली गतिविधियों से जोड़ना और उन्हें मुख्यधारा के समाज का हिस्सा बनकर सम्मान के साथ अपनी जिंदगी फिर से शुरू करने में मदद करना है।

अधिकारी ने कहा कि पुनर्वास केंद्र में शुक्रवार को यह त्योहार मनाया जाएगा।

पुनर्वास केंद्र में रहने वाले कुछ लोगों के लिए, यह गतिविधि सिर्फ राखी बनाने और बेचने से कहीं अधिक है। यह उनके लिए ऐसे त्योहार को मनाने का पहला अनुभव है जिसके बारे में उन्होंने जंगलों में बिताए सालों के दौरान सिर्फ सुना था।

पूर्व माओवादी सुनीता कोवाची ने कहा कि उन्होंने बिना कोई त्योहार मनाए जंगलों में कई साल बिताए थे।

सुनीता ने कहा, ‘‘इतने सालों तक हम जंगलों में रहे। हमने कभी कोई त्योहार नहीं मनाया और न ही राखियां बनाईं। इस बार, केंद्र में सभी ने मिलकर राखियां बनाईं। हम सुरक्षाकर्मियों और अपने साथियों को राखी बांधकर त्योहार मनाना चाहते हैं।’’

सुनीता ने कहा कि राखी बनाना उनके लिए एक नया अनुभव था।

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार राखी बनाई। हम सबने मिलकर काम किया और सिर्फ दो दिनों में एक हजार से अधिक राखियां तैयार कीं। ऐसा लग रहा है जैसे हमें नयी जिंदगी मिली हो।’’

संकाई उसेंडी ने बताया कि स्वयं-सहायता समूहों के सदस्यों ने उन्हें सिर्फ एक नमूना राखी दिखायी थी, जिसके बाद प्रशिक्षण लेने वालों ने मिलकर राखी बनाना सीखा।

वहीं, देवकी पुरामे ने कहा कि उन्होंने पहले सिर्फ रक्षाबंधन के बारे में सुना था।

देवकी ने कहा, ‘‘पहले हमने बस सुना था कि रक्षाबंधन नाम का कोई त्योहार होता है। इस बार, जब स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने हमें राखी बनाना सिखाया और हमने खुद राखियां बनाईं, तो हमें बहुत खुशी हुई।’’

अधिकारियों ने बताया कि समर्पण करने वाले नक्सलियों को वाहन चलाने, सिलाई, लकड़ी का काम और इलेक्ट्रीशियन जैसे कामों का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। साथ ही केंद्र में शिक्षा भी दी जाती है।

अधिकारियों ने बताया पूर्व नक्सलियों के लिए राखी मनाना शायद सिर्फ एक और त्योहार मनाने से कहीं ज्यादा होगा। यह उन्हें इस बात की याद दिलाएगा कि जिन हाथों का इस्तेमाल कभी हिंसा के लिए किया जाता था, वे हाथ अब कुछ बना भी सकते हैं, कमा भी सकते हैं और फिर से जिंदगी भी संवार सकते हैं।

चौगेल पुनर्वास केंद्र पिछले साल नवंबर में शुरू किया गया था, जिसमें आत्मसमर्पण करने वाले 66 माओवादियों और माओवादी हिंसा के पीड़ितों को प्रशिक्षु के रूप में शामिल किया गया था।

उन्होंने बताया कि अभी इस केंद्र में 28 पूर्व माओवादी प्रशिक्षण ले रहे हैं।

इस साल 31 मार्च को राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ को हथियारबंद माओवादियों से मुक्त घोषित किया था।

भाषा सं संजीव मनीषा शफीक

शफीक

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