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High Court on BEd College: कॉलेजों ने अपनाया चालाकि वाला रास्ता, तो हाईकोर्ट ने लगा दी फटकार, इस मामले छात्रों की फीस वापस करनी होगी, इतना जुर्माना भी तय

High Court on BEd College: मध्यप्रदेश के उन छात्रों और बीएड कॉलेजों को झटका लगा है, जिन्होंने काउंसलिंग और एडमिशन की राहत की मांग की थी।

gwalior news

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muskan mishra
Published: 06 Feb 2026 | 10:17 amModified: 06 Feb 2026 | 10:24 am
HIGHLIGHTS
  1. हाई कोर्ट ने कॉलेजों को फटकारा
  2. बीएड कॉलेजों को वाणिज्यिक बताया
  3. यूनिवर्सिटी ने सही फैसला लिया

ग्वालियर: मध्यप्रदेश के उन छात्रों और बीएड कॉलेजों को झटका लगा है, जिन्होंने काउंसलिंग और एडमिशन की राहत की मांग की थी। पूरा मामला क्या है और हाईकोर्ट ने क्या कहा चलिए विस्तार से आपको इस खबर में बताते हैं।

BEd Admission Update: क्या है पूरा मामला ?

न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की डिवीजन बेंच ने तल्ख टिप्पणी करते हुए इन कॉलेजों को वाणिज्यिक दुकानें करार दिया और स्पष्ट किया कि जीवाजी यूनिवर्सिटी ने इन कॉलेजों को संबद्धता (एफिलिएशन) न देने का जो फैसला लिया, वह बिल्कुल सही था।

आपको बता दें कि, हाईकोर्ट ने कहा कि जिन कॉलेजों ने गलत तरीके से छात्रों को प्रवेश दिया है, उन्हें तुरंत पूरी फीस वापस करनी चाहिए। साथ ही, याचिका दायर करने वाले प्रत्येक कॉलेज पर 25-25 हजार रुपए की कॉस्ट भी लगाई गई है। यह राशि किशोर न्याय फंड में जमा करनी होगी। कोर्ट के इस फैसले ने साफ संदेश दिया कि शिक्षा संस्थानों को वाणिज्यिक गतिविधियों की तरह संचालित नहीं किया जा सकता और छात्रों की पढ़ाई के साथ छेड़छाड़ करना गंभीर मामला है।

कोर्ट ने छात्रों को भी राहत देने से इनकार कर दिया, जिन्होंने सहानुभूति के आधार पर कोर्स जारी रखने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि छात्रों ने बिना जांच-पड़ताल किए गलत कॉलेज का चयन किया और इसलिए वे केवल अपनी फीस वापसी के हकदार हैं, पाठ्यक्रम जारी रखने के नहीं। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा के क्षेत्र में गलत कदम उठाने वाले छात्र या संस्थान किसी भी तरह से विशेष सहानुभूति के पात्र नहीं हो सकते।

MP High Court BEd ruling: एनसीटीई की कार्यप्रणाली पर भी कटाक्ष

High Court on BEd College मामले में हाई कोर्ट ने नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) की कार्यप्रणाली पर भी कटाक्ष किया। अदालत ने कहा कि एनसीटीई को अपनी कार्यशैली में सुधार करना होगा ताकि किसी भी कॉलेज के नाम पर गड़बड़ी न हो और शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके। कोर्ट ने एनसीटीई को निर्देश दिया कि वह कॉलेजों की एफिलिएशन प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही लाए।

मामले का प्रारंभ विद्या-सुधा वेलफेयर फाउंडेशन समिति और अन्य कॉलेजों की ओर से याचिका दायर करने से हुआ। दरअसल, एसटीएफ द्वारा आपराधिक मामलों के दर्ज होने के कारण जीवाजी यूनिवर्सिटी ने सत्र 2025-26 के लिए इन कॉलेजों को संबद्धता नहीं दी थी। इन कॉलेजों ने यूनिवर्सिटी के निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट में राहत की मांग की थी।

हाई कोर्ट का यह फैसला छात्रों और कॉलेजों दोनों के लिए बड़ा संदेश है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षा का व्यवसाय नहीं होना चाहिए और नियमों और गुणवत्ता की अनदेखी करने वाले संस्थानों को किसी भी तरह की सहानुभूति नहीं मिलेगी। यह फैसला यह भी दर्शाता है कि विश्वविद्यालयों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहना होगा और केवल नियमों के आधार पर एफिलिएशन देना होगा।

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लेखक के बारे में

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muskan mishra

पत्रकारिता और क्रिएटिव राइटिंग में स्नातक हूँ। मीडिया क्षेत्र में 3 वर्षों का विविध अनुभव प्राप्त है, जहां मैंने अलग-अलग मीडिया हाउस में एंकरिंग, वॉइस ओवर और कंटेन्ट राइटिंग जैसे कार्यों में उत्कृष्ट योगदान दिया। IBC24 में मैं अभी Trainee-Digital Marketing के रूप में कार्यरत हूँ।

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Web Title: Colleges resorted to trickery, prompting the High Court to reprimand them

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