MP High Court on Roads and Law & Order/Image Credit: IBC24
MP High Court on Roads and Law & Order: भोपाल: ग्वालियर में अगर कोई मुद्दा सबसे बड़ा है तो वो है खराब सड़कें। IBC24 ने सड़कों की बदहाली की तस्वीरें लगातार दिखाईं। कहीं सड़कें गड्ढों में तब्दील, तो कहीं हालात ऐसे कि सड़क और सुरंग में फर्क करना मुश्किल। मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जनहित याचिका दायर हुई। अब हाईकोर्ट के आदेश पर सड़कों की सैंपलिंग और गुणवत्ता की जांच हो रही है। दरअसल सड़क बनाने से लेकर उसकी गुणवत्ता जांचने तक का जिम्मा सरकारी एजेंसियों का था, लेकिन सड़क की असलियत सामने लाने और उसकी जांच कराने के लिए मामला अदालत तक पहुंचा और ये अकेला मामला नहीं है। ग्वालियर-बिलौआ में अवैध खनन रोकने के लिए हाईकोर्ट को आदेश देना पड़ा। ग्वालियर-चंबल में अवैध रेत और पत्थरों के उत्खनन पर हाईकोर्ट के साथ-साथ सुप्रीम अदालत को सख्ती करनी पड़ी। स्वर्ण रेखा और मुरार नदी को बचाने के लिए कोर्ट को आगे आना पड़ा। पहाड़ियों से अतिक्रमण हटाने के आदेश देने पड़े.. मंदिरों की जमीनों को बचाने के लिए न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा। यानी सिस्टम मौजूद है, विभाग मौजूद हैं, अधिकारी मौजूद हैं। ऐसे में सवाल ये है कि कार्रवाई के लिए फिर कोर्ट को क्यों आदेश देना पड़ रहा है।
सबसे गंभीर सवाल पुलिस व्यवस्था पर है। एक दिन पहले नाबालिग बच्ची के अपहरण मामले में पुलिस की जांच पर हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए और CBI जांच के आदेश तक देने पड़े। सुनवाई के दौरान जस्टिस ने पूछा क्या प्रदेश में पुलिस को कानून सिखाने की जरूरत है? ये टिप्पणी सिर्फ पुलिस के लिए नहीं… बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है। क्योंकि जब जांच पर भरोसा नहीं रहेगा, जब शिकायत पर कार्रवाई नहीं होगी, जब अवैध खनन नहीं रुकेगा, जब सड़क की गुणवत्ता विभाग खुद सुनिश्चित नहीं करेगा तो जनता आखिर जाएगी कहां?
MP High Court on Roads and Law & Order: तो सवाल सिर्फ अदालत के दखल का नहीं है। सवाल सरकारी सिस्टम की कार्यशैली का है। अगर सड़क की गुणवत्ता जांचने के लिए कोर्ट को सैंपलिंग करानी पड़े, अगर खनन रोकने के लिए कोर्ट को आदेश देना पड़े। अगर नदी बचाने के लिए कोर्ट को दखल देना पड़े और अगर पुलिस की जांच पर कोर्ट को CBI बुलानी पड़े, तो फिर सरकार के सिस्टम में जवाबदेही किसकी है? क्योंकि जनता टैक्स देती है, सरकार को चुनती है और बदले में उसे काम चाहिए, कोर्ट के आदेश नहीं।
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