पुनर्वास अभियान: मध्य प्रदेश में बंदूक छोड़ सिलाई और ड्राइविंग सीख रहे नक्सली

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पुनर्वास अभियान: मध्य प्रदेश में बंदूक छोड़ सिलाई और ड्राइविंग सीख रहे नक्सली

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  • Publish Date - March 17, 2026 / 02:14 PM IST,
    Updated On - March 17, 2026 / 02:14 PM IST

बालाघाट (मप्र), 17 मार्च (भाषा) घने जंगलों में हथियार उठाने की जिंदगी छोड़कर सिलाई-कढ़ाई और वाहन चलाने जैसे हुनर सीखने के साथ ही यहां आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली अब मुख्यधारा में लौटने की कोशिश कर रहे हैं। पुलिस ने मंगलवार को यह जानकारी दी।

कभी नक्सल गतिविधियों का गढ़ रहे मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में अब ये पूर्व नक्सली शांतिपूर्ण जीवन अपनाते हुए नयी शुरुआत करने में जुटे हैं। पुलिस इनके पुनर्वास के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पिछले साल दिसंबर में कहा था कि राज्य नक्सल समस्या से मुक्त हो चुका है। केंद्र ने भी 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है।

जिला पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा ने संवाददाताओं को बताया, ‘‘जो नक्सली पहले बंदूक उठाते थे, वे अब सिलाई-कढ़ाई, ड्राइविंग और जेसीबी (खुदाई मशीन) चलाना सीख रहे हैं। जिले को नक्सलवाद से मुक्त किए जाने के बाद पुलिस आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को समाज में फिर से घुलने-मिलने और आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रही है।’’

उन्होंने बताया कि फिलहाल आत्मसमर्पण करने वाले 10 नक्सली – पांच पुरुष और पांच महिलाएं, यहां पुलिस लाइन में सिलाई और ड्राइविंग का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

उपनिरीक्षक राजाराम विश्वकर्मा ने बताया कि ये लोग करीब डेढ़ महीने से सिलाई का प्रशिक्षण ले रहे हैं ताकि वे अपना रोजगार शुरू कर सकें।

मिश्रा ने बताया कि पुलिस ने उन 14 लोगों के परिजनों को भी पुलिस विभाग में आरक्षक के पद पर नौकरी दी है, जिन्हें नक्सलियों ने पुलिस मुखबिर होने के संदेह में मार डाला था।

उन्होंने कहा कि इस पहल से उन परिवारों को राहत मिली है जो नक्सली हिंसा में अपनों को खोने के बाद लंबे समय से दुख और संकट में जी रहे थे।

विश्वकर्मा ने बताया कि सुमित बहुत छोटा था जब 2002 में उसके पिता की हत्या कर दी गई थी। शुरुआत में वह पुलिस की नौकरी को लेकर आशंकित था, लेकिन अब वह इसे सकारात्मक रूप में देखने लगा है।

उन्होंने बताया कि राशिमेटा निवासी संजय कुमार पूसम ने भी बचपन में अपने पिता को नक्सली हिंसा में खो दिया था। आठवीं तक पढ़ाई करने वाले पूसम ने कभी नहीं सोचा था कि उसे पुलिस में नौकरी मिलेगी।

मिश्रा ने कहा, ‘‘सरकार और विभाग की नीतियों के जरिए हम नक्सलियों और नक्सली हिंसा से प्रभावित परिवारों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे समाज में अच्छा संदेश जा रहा है।’’

भाषा सं दिमो गोला

गोला