Narmada Milk Controversy : दूध बहाना पुण्य है या पाप? IBC24 के मैनेजिंग एडिटर के सामने भिड़े शिक्षाविद और बाबा, नर्मदा तट पर मचा भारी बवाल

सीहोर में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध बहाने की घटना ने आस्था और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच गहरी बहस छेड़ दी है। एक ओर परंपरा का हवाला दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर कुपोषण और संसाधनों की बर्बादी पर सवाल उठ रहे हैं।

Narmada Milk Controversy : दूध बहाना पुण्य है या पाप? IBC24 के मैनेजिंग एडिटर के सामने भिड़े शिक्षाविद और बाबा, नर्मदा तट पर मचा भारी बवाल

Narmada Milk Controversy / Image Source : IBC24

Modified Date: April 12, 2026 / 06:39 pm IST
Published Date: April 12, 2026 6:31 pm IST
HIGHLIGHTS
  • नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध बहाने पर देशभर में बहस
  • आस्था बनाम कुपोषण का मुद्दा बना बड़ा सवाल
  • वैज्ञानिक तर्क और संत समाज के विचार आमने-सामने

सीहोर : Narmada Milk Controversy  मध्य प्रदेश के सीहोर में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध बहाने की घटना ने इस समय पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है। यह मुद्दा अब केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अटूट आस्था और ‘सामाजिक जिम्मेदारी’ के बीच का टकराव बन गया है। जहाँ एक पक्ष का तर्क है कि नर्मदा मैया को दूध अर्पित करना सदियों पुरानी परंपरा और श्रद्धा का विषय है, वहीं दूसरा पक्ष उन भयावह आंकड़ों की ओर इशारा कर रहा है जहाँ प्रदेश के लगभग 10 लाख बच्चे आज भी कुपोषण से जूझ रहे हैं।

इस गंभीर विषय पर IBC24 के मैनेजिंग एडिटर प्रवीण दुबे ने सीहोर में नर्मदा तट पर पहुँचकर जनता और जानकारों से सीधी चर्चा की। सवाल उठ रहा है कि जिस प्रदेश में दूध की एक-एक बूंद किसी मासूम की जान बचा सकती है, क्या वहाँ धर्म के नाम पर हजारों लीटर संसाधनों को नदी में बहा देना तार्किक है? आस्था और मानवीय सरोकारों के बीच छिड़ी यह जंग अब प्रशासन और आम जनता के लिए आत्मचिंतन का विषय बन गई है।

विज्ञान और प्रदूषण का तर्क

बहस की शुरुआत करते हुए शिक्षाविद अवि शुक्ल ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में दूध को नदी के पानी में बहाने से जल प्रदूषण फैलता है। जब प्रवीण दुबे ने उनसे सवाल किया कि क्या ऐसी टिप्पणियां सनातन विरोधी नहीं लगतीं, तो अवि शुक्ल ने स्पष्ट जवाब दिया। उन्होंने कहा, यह सनातन विरोध कैसे हुआ? मैं खुद पूजा-पाठ करती हूँ, लेकिन सवाल यह है कि क्या भगवान को खुश करने का तरीका सही है? क्या एक लोटा दूध चढ़ाने से भगवान खुश नहीं होंगे? क्या हम 11 हजार लीटर दूध कुपोषित बच्चों को देकर अपनी आस्था पूरी नहीं कर सकते?”

Narmada Abhishek Controversy संत समाज का पलटवार: “नर्मदा नदी नहीं, मां है”

अवि शुक्ल के लॉजिक पर तट पर मौजूद संतों और बाबाओं ने कड़ा ऐतराज जताया। बहस के दौरान जब प्रवीण दुबे ने पूछा कि “11 हजार लीटर दूध बहाने से किसका भला हो रहा है?”, तो एक बाबा ने जवाब दिया: बाबा ने कहा कि नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि साक्षात् ‘मां’ है। नर्मदा पुराण में उल्लेख है कि नर्मदा मैया हमें दूध  पिलाती हैं, जिनसे हमारी जिंदगी चलती है। संतों का तर्क था कि यदि हम अपनी मां का अभिषेक दूध से कर रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है? उन्होंने इसे अपनी अटूट श्रद्धा का हिस्सा बताया और वैज्ञानिक तर्कों को आस्था के सामने गौण करार दिया।

कुपोषण बनाम अटूट श्रद्धा

मैनेजिंग एडिटर प्रवीण दुबे ने इस बहस को एक तार्किक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया । एक तरफ वह वर्ग है जो मानता है कि हजारों लीटर दूध नालियों या नदियों में बहाने के बजाय प्रदेश के उन 10 लाख कुपोषित बच्चों तक पहुँचना चाहिए जिन्हें इसकी सख्त जरूरत है। वहीं दूसरी तरफ, धार्मिक मान्यताओं को सर्वोपरि मानने वाला समाज है, जो इसे अपनी संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग मानता है। सीहोर के तट पर छिड़ी यह गहमगहमी आज पूरे देश के लिए एक बड़ा सवाल बन गई है।

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लेखक के बारे में

I’m Sneha Singh, a journalist and storyteller committed to ethical, ground-level, and impact-oriented reporting. A Gold Medalist in Journalism And Mass Communication, I believe in telling stories with accuracy, sensitivity, and purpose. Currently working with IBC24, I specialize in content writing, news production, and modern storytelling bridging facts with human experiences to inform, engage, and inspire audiences..