प्रख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन

प्रख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन

प्रख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन
Modified Date: January 8, 2026 / 05:49 pm IST
Published Date: January 8, 2026 5:49 pm IST

जबलपुर (मध्यप्रदेश), आठ जनवरी (भाषा) प्रसिद्ध कथाकार और साहित्यकार ज्ञानरंजन का 90 वर्ष की आयु में बुधवार रात यहां के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार बृहस्पतिवार दोपहर स्थानीय गौरी घाट मुक्तिधाम में किया गया।

ज्ञानरंजन के पुत्र शांतनु ने यह जानकारी दी।

देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में विशेष स्थान रखने वाली पत्रिका ‘पहल’ के संपादक के रूप में काम कर चुके ज्ञानरंजन के निधन की खबर के साथ ही कथा और साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई तथा बड़ी संख्या में स्थानीय कथाकार एवं साहित्यकार और उनके चाहने वाले उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए।

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ज्ञानरंजन के पारिवारिक मित्र पंकज स्वामी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि वह वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे और बुधवार सुबह तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां रात साढ़े दस बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।

उन्होंने बताया कि साहित्यकार ज्ञानरंजन के परिवार में पत्नी सुनयना, पुत्री वत्सला और पुत्र शांतनु हैं।

शांतनु ने ‘पीटीआई-वीडियो’ से बातचीत में कहा कि चलने-फिरने में असमर्थता के कारण उनके पिताजी को बुधवार शाम अस्पताल में भर्ती कराया गया था और डॉक्टरों की टीम ने उन्हें बचाने का पूरा प्रयास किया लेकिन सब विफल साबित हुआ।

उन्होंने कहा, ‘‘रात 10.30 बजे रक्तचाप कम हो जाने और शरीर के सारे महत्वपूर्ण अंगों के काम बंद करने से उनका निधन हो गया। आज हम लोग बहुत अकेलापन महसूस कर रहे हैं।’’

मशहूर कवि मनोहर बिल्लौरे ने ‘पीटीआई-वीडियो’ से बातचीत में कहा, ‘‘वह मेरे इतने अजीज थे कि हर दिन शाम में सात बजे बुलाते थे। नहीं बुलाते थे तो मैं खुद चला आता था। मैं उनसे लगातार जुड़ा रहा। वे न केवल एक बड़े कथाकार थे, बल्कि हिंदी साहित्य की वैचारिक और रचनात्मक चेतना के सशक्त प्रतिनिधि भी थे।’’

उन्होंने कहा कि साहित्य और कला जगत को लेकर उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक था और वे नयी पीढ़ी को इसके लिए हमेशा प्रोत्साहित किया करते थे।

जानेमाने व्यंग्यकार रमेश सैनी ने कहा कि बुधवार शाम ही उनसे मुलाकात हुई थी और उन्होंने खुलकर बात की थी।

उन्होंने कहा, ‘‘साहित्य के प्रति ज्ञान जी इतने समर्पित थे कि वह नए और पुराने लोगों को अक्सर प्रोत्साहित करते थे।’’

ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवम्बर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला जिले में हुआ था।

उनका प्रारम्भिक जीवन महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में व्यतीत हुआ और फिर उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की।

वर्ष 2013 में जबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद ‘डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर’ की उपाधि प्रदान की।

वह जबलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध जी. एस. कॉलेज में हिन्दी के प्रोफ़ेसर रहे और 34 वर्ष की सेवा के बाद 1996 में सेवानिवृत्त हुए।

ज्ञानरंजन के अनेक कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए और अनूठी गद्य रचनाओं की उनकी एक क़िताब ‘कबाड़खाना’ बहुत लोकप्रिय हुई। उन्हें हिन्दी संस्थान के ‘साहित्य भूषण सम्मान’, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’, मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग के ‘शिखर सम्मान’ और ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ से भी नवाजा जा चुका है।

भाषा सं, ब्रजेन्द्र

रवि कांत नरेश

नरेश


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