देखिए सतना विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड
देखिए सतना विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड
रायपुर। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है मध्यप्रदेश की सतना विधानसभा सीट की। विंध्य क्षेत्र की अहम विधानसभा सीट है सतना। फिलहाल यहां पर बीजेपी के शंकर लाल तिवारी विधायक हैं, जो 2003 से यहां चुनाव जीत रहे हैं और आगामी चुनावी जंग में उतरने के लिए रणनीति बनाने में जुट गए हैं। शंकर लाल तिवारी के लिए इस बार जीत की राह इतनी आसान नहीं होगी क्योंकि नेताजी पिछले 15 सालों में क्षेत्र का वैसे विकास नहीं करवा सके, जैसी उनसे उम्मीद लगाई जा रही थी। बेरोजगारी, जलसंकट, खस्ता हाल सड़कों सहित अधूरी योजनाएं यहां की प्रमुख समस्याएं हैं और इन मुद्दों की गूंज आने वाले चुनाव में सुनाई देना तय है।
दूर से ही नजर आने वाली ये सीमेंट फैक्टरियां ही इस इलाके की पहचान है। सीमेंट हब के तौर पर विख्यात सतना मध्यप्रदेश के औद्योगिक नगरों में शामिल है लेकिन औद्योगिक नगरी होने के बावजूद ये इलाका विकास के नाम पर उपेक्षित ही रहा है। आज भी यहां के बाशिंदे सड़क और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रहे हैं।
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सतना विधानसभा के लिए विकास के नाम पर यहां बड़े-बड़े मॉडल तो तैयार किए गए लेकिन वो फाइलों में ही दबकर रह गए हैं। वर्तमान में यहां पर बीजेपी का कब्जा है लिहाजा कांग्रेस ने इन मुद्दों को लेकर बीजेपी विधायक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि पिछले 15 सालों में सतना में विकास के एक भी बड़े प्रोजेक्ट नहीं आए हैं। इसके अलावा विधायक ने जनहित और विकास के लिए कोई काम नहीं किया है जिससे ये इलाका सालों पीछे रह गया है।
विपक्ष के आरोपों से बीजेपी विधायक बहुत ज्यादा चिंतित नही हैं। उनका दावा है कि सतना के सर्वांगीण विकास के लिए उन्होंने काफी काम किया है। क्षेत्र में विकास की परियोजनाएं स्वीकृत कराने में उन्होंने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी है। विधायक अपनी उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्त भी गिनाना नहीं भूलते।
विंध्य क्षेत्र की इस अहम विधानसभा सीट पर हमेशा ही बड़े और दिग्गज नेताओं का हस्तक्षेप रहा है। अर्जुन सिंह से लेकर उनके बेटे अजय सिंह राहुल हो या फिर कई दिग्गज नेता सतना की सियासत में हर किसी ने दिलचस्पी रखी है। यही वजह है कि यहां के विकास में श्रेय लेने बात हो या फिर काम में रोड़े अटकाने की कांग्रेस का नाम हर मामले में लिया जाता है। सतना विधानसभा क्षेत्र में प्रस्तावित और निर्माणाधीन फ्लाईओवर को लेकर भी ऐसी ही बातें सामने आ रही है।
चुनावी साल है तो कांग्रेस हो या फिर बीजेपी दोनों ही दलों के नेता न केवल खुद को जनता का सच्चा हिमायती बताने की कोशिश कर रहे है बल्कि एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप भी लगा रहे हैं ताकि वो जनता का दिल जीतकर चुनावी जंग जीते।
जिला मुख्यालय का तमगा हासिल करने के बाद भी सतना विधानसभा क्षेत्र अपने माथे से पिछड़ेपन का दाग नहीं धो पाया है। सतना शहर में बुनियादी सुविधाओं की कमी के साथ प्रदूषण और बिगड़े यातायात की समस्याएं यहां भी सर उठाए खड़ी है। बावजूद इसके इन समस्याओं के समाधान की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं जाता। विधायक कैसा होता है, सतना विधानसभा क्षेत्र के बहुत से लोग यही सवाल पूछ रहे हैं। यहां कई इलाकों में विधायक महोदय जीतने के बाद से नजर ही नहीं आए हैं। जनता बेचारी राज्य की विधानसभा में उनका नेतृत्व करने वाले नुमाइंदे को तलाशती फिर रही है।
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जब विधायक नजर ही नहीं आएंगे तो लोग किसे अपना दुखड़ा सुनाएंगे। जाहिर है यहां समस्य़ाओं का अंबार है। सतना में सबसे बड़ी समस्या पानी है। यहां की जनता को पानी के लिए टैंकरों के भरोसे है, जिस दिन टैंकर आता है। पानी मिलता है। नहीं तो बिना पानी के ही लोगों को गुजारा करना पड़ता है।
सीएम शिवराज सिंह चौहान खुद सतना के लिए कई बड़े वादे किए। केंद्र सरकार ने भी सतना को स्मार्ट सिटी मिशन में शामिल किया, लेकिन इसके बावजूद ने तो यहां बड़ी परियोजनाओं की आधारशिला रखी गई है और ना ही क्षेत्र को स्मार्ट सिटी में शामिल होने का लाभ ही मिल पा रहा है।
शंकर लाल तिवारी पिछले 15 सालों से सतना से विधायक चुने जा रहे हैं। बावजूद इसके विंध्य का ये इलाका पिछड़ा हुआ नजर आता है। बुनियादी सुविधाओं के अलावा जल आवर्धन योजना की लेटलतीफी, सड़कों की खस्ता हालत के साथ स्वास्थ्य और शिक्षा की बेपटरी व्यवस्थाओं ने लोगों को खासा नाराज कर दिया है, जो आगामी चुनाव में मुद्दे बन सकते हैं। कांग्रेस ने विधायक को घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। वहीं विधायक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। विधायक भले जो भी दावे करें और अपनी तरफ से लाख सफाई दें, लेकिन चुनाव के मैदान में उन्हें ऐसे कई सवालों का सामना करना पड़ेगा जिनका जवाब देना उनके लिए आसान नहीं होगा।
1990 के बाद से सीट पर बीजेपी का दबदबा है हालांकि सतना की जनता पार्टी से ज्यादा व्यक्ति विशेष की लोकप्रियता और साफ स्वच्छ छवि देख कर वोट करती आ रही है। यही वजह है कि दोनों ही पार्टियां यहां अपना उम्मीदवार ऐसा चुनती है, जो जनता की कसौटी में खरा उतर सके। जहां तक टिकट बंटवारे का सवाल है तो बीजेपी से शंकरलाल तिवारी के अलावा कोई दूसरा बड़ा चेहरा फिलहाल नजर नहीं आता। वहीं कांग्रेस में कई युवा नेता कर्नाटक फॉर्मूले के तहत टिकट की मांग कर रहे हैं।
सतना विधानसभा में वैसे तो मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही होता आ रहा है। यहां की जनता ने बारी-बारी से कांग्रेस और बीजेपी दोनों को जीत का सेहरा पहनाया है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डाले तो बीजेपी के टिकट पर शंकरलाल तिवारी जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं। वैसे सतना के सियासी इतिहास को देखा जाए तो 1952 में अस्तित्व में आई इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस के विवानंद पहली बार विधायक चुने गए। 1962 में भारतीय जनसंघ के ‘दादा शुखेंद्र सिंह’ ने कांग्रेस से ये सीट छिन ली। लेकिन इसके बाद 1967 से 1985 तक लगातार कांग्रेस इस सीट पर काबिज रही। 1990 के चुनाव में बीजेपी के टिकट पर ब्रजेन्द्र नाथ पाठक ने चुनाव जीता। 1993 में भी सीट बीजेपी के कब्जे में रही। 1998 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सईद अहमद ने बीजेपी के मांगे राम गुप्ता को शिकस्त दी। इस चुनाव में शंकर लाल तिवारी निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़कर दूसरे पायदान पर थे। इसके बाद 2003 में शंकर लाल तिवारी ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा, तब से सतना सीट पर शंकर लाल तिवारी चुनाव जीत रहे हैं।
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सीट पर जाति समीकरण भी अहम रहा है। यहां सबसे अधिक मतदाता ब्राह्मण और वैश्य समाज से आते हैं जो हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते आ रहे हैं। अब जब चुनावी बिगुल बज उठा है..तो सतना में टिकट पाने के लिए नेता एक्टिव मूड में आ गए हैं। बीजेपी से वर्तमान विधायक शंकर लाल तिवारी एक बार फिर टिकट के लिए ताल ठोंक रहे हैं। बीजेपी से टिकट की दावेदारी केवल शंकर लाल तिवारी ही नहीं कर रहे। बल्कि जाति समीकरण को देखते हुए पुष्कर सिंह तोमर और बीजेपी नगर अध्यक्ष नरेंद्र त्रिपाठी भी टिकट पाने की जुगत में हैं। वहीं कांग्रेस में भी कमोबेश हालात वही है। विधायक का टिकट पाने के लिए कई नेता ताल ठोंक रहे हैं। दिलचस्प बात ये है टिकट हासिल करने का ख्वाब ऐसा नेता भी देख रहे हैं। जिन्होंने हाल ही में सियासत में कदम रखा है। इनके मुताबिक मध्यप्रदेश में भी कर्नाटक फार्मूले के तहत युवाओं को मौका देना चाहिए।
कुल मिलाकर सतना में दोनों दलों में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है। हालांकि बीजेपी जहां शंकरलाल तिवारी पर अपना दांव फिर खेल सकती है तो वहीं कांग्रेस युवा चेहरे को मौका देकर बीजेपी के अभेद्य किले को भेदने की कोशिश कर सकती है।
वेब डेस्क, IBC24

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