बड़वानी। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है मध्यप्रदेश की सेंधवा विधानसभा सीट की। पिछले तीन विधानसभा चुनाव से सीट पर बीजेपी का कब्जा है और यहां के विधायक अंतर सिंह आर्य पिछले 10 सालों से मध्यप्रदेश सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर हैं। लेकिन सेंधवा में विकास की रफ्तार को देखकर तो यही लगता है कि इलाके को अंतर सिंह आर्य के मंत्री होने का ज्यादा कुछ फायदा नहीं हुआ। मुद्दों की बात की जाए तो यहां कपास इंडस्ट्री की बदहाली को लेकर बड़ा वर्ग विधायक और राज्य सरकार से नाराज है। वहीं फैक्ट्रियों के बंद होने से बेरोजगारी भी यहां बड़ा सियासी मुद्दा बनता जा रहा है।
बड़वानी जिले में आने वाली सेंधवा विधानसभा क्षेत्र मध्यप्रदेश की हाईप्रोफाइल और खास सीटों में से एक है। खास इसलिए कि यहां से शिवराज सरकार में कैबिनेट मंत्री अंतर सिंह आर्य विधायक हैं और सीट पर 2003 से बीजेपी का ही कब्जा है। सत्तारुढ़ दल का विधायक होने का कारण सेंधवा की जनता को उम्मीद थी कि उनका और क्षेत्र का विकास तेजी से होगा। लेकिन हालात ये कि जिस कपास इंडस्ट्री के लिए सेंधवा की पहचान होती थी, उनमें से आज अधिकतर फैक्टियां बंद हो चुकी है या फिर महाराष्ट्र शिफ्ट हो गई। पिछले 8-10 सालों में सेंधवा से लगभग 100 कपास की जिनिंग फैक्ट्री बंद हो गई और वर्तमान में केवल 5 से 10 फैक्टरियां ही चालू है। व्यापारियों की मानें तो मंडी टैक्स में मिलने वाली छूट और सहुलियत उन्हें महाराष्ट्र गर्वमेंट से अधिक मिलती है, जबकि मध्य प्रदेश में उनको उतनी सहूलियत नहीं मिल रही है जिससे यहां पर उद्योग चलाना बहुत अधिक फायदे का सौदा नहीं रहा।
कपास इंडस्ट्री से जुड़े कारोबारियों की ये नाराजगी इसलिए भी जायज है कि इन फैक्ट्रियों के बंद होने से यहां के मजदूरों को पलायन करना पड़ रहा है। वहीं बेरोजगारी भी आने वाले चुनाव में बड़ा सियासी मुद्दा होगा। सेंधवा में सड़कों की हालत भी खराब हो चुकी है।जिसे लेकर लोगों में नाराजगी साफ देखी जा सकती है। चुनावी साल है तो कांग्रेस इन मुद्दों को सियासी रंग देने लगी है। हालांकि अंतर सिंह आर्य का दावा है कि उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र में खूब काम कराए हैं। उनके पास गिनाने के लिए उपलब्धियों की बड़ी लिस्ट है। जाहिर है प्रदेश के कद्दावर नेता के विधानसभा क्षेत्र सेंधवा में आने वाले चुनाव में कई मुद्दे गूंजने वाले हैं। विधायक के पास यदि उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्त है तो कांग्रेस के पास उनके खिलाफ आरोपों की लंबी लिस्ट है।
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सेंधवा के सियासी समीकरण की बात की जाए तो बीजेपी यहां लगातार तीन चुनाव जीत कर मजबूत नजर आती है। वैसे बीजेपी की पूरी राजनीति यहां अंतर सिंह आर्य के आसपास ही घूमती है। बीजेपी अगर इस विधानसभा क्षेत्र में सफल हो रही है तो इसमें काग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी का बड़ा हाथ रहा है। ऐसे में कांग्रेस को आगामी विधानसभा चुनाव जीतना है तो उसे भीतरघात से निपटना होगा। सीट पर जाति समीकरण भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करते हैं।
सेंधवा की सियासत में यूं तो मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही रहा है। लेकिन इस सीट पर बागी नेताओं की बगावत का खामियाजा दोनों ही राजनीतिक दलों को भुगतना पड़ा है। हालांकि इस दिलचस्प सियासी समीकरण के बीच पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बीजेपी बाजी मार रही है। कांग्रेस की बात करें तो अरुण यादव का सेंधवा विधानसभा क्षेत्र में वर्चस्व रहा है। यहां के वोटरों के साथ स्थानीय नेताओं पर भी अरुण यादव की छवि का असर देखने को मिलता है। इनके अलावा पूर्व विधायक ग्यारसीलाल रावत और सुखलाल परमार की भी अच्छी खासी पकड़ है। जाहिर है कांग्रेस यहां अलग-अलग गुटों में बंटी नजर आती है। जिसका फायदा चुनाव में बीजेपी और अंतर सिंह आर्य को मिलता रहा है।
सेंधवा विधानसभा सीट पर पिछले 15 सालों से लगातार विधायक हैं।2003 में अंतर सिंह आर्य ने कांग्रेस के ग्यारसीलाल रावत को हराकर सीट पर कब्जा जमाया। इस चुनाव में सुखलाल परमार एनसीपी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इसके बाद 2008 में सुखलाल परमार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े। लेकिन उन्हें भी अंतर सिंह आर्य के हाथों शिकस्त खानी पड़ी। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने दोनों दिग्गजों को दरकिनार करते हुए एक नए चेहरे दयाराम बाटा को टिकट दिया। लेकिन वो भी अंतर सिंह आर्य को हराने में नाकाम रहे। इस चुनाव में बीजेपी को जहां.88821 वोट मिले। वहीं कांग्रेस महज 63135 वोट ले सकी। इस तरह जीत का अंतर 25686 वोटों का रहा।
सेंधवा में जातिगत समीकरण भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करता है। आदिवासी बाहुल्ल इलाका होने के कारण सेंधवा विधानसभा को अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व है। यहां कुल मतदाता 2 लाख43 हजार 566 है। जिसमें से 77 फीसदी मतदाता अनुसूचित जनजाति से आते हैं। लेकिन अनुसूचित जनजातियों में भी 2 जातियां आती है। एक है बारेला जिसके यहां 73 फीसदी मतदाता है और हर विधानसभा चुनाव में किंग मेकर की भूमिका निभाता है। वहीं दूसरी भिलाला समाज के 4 फीसदी वोटर हैं। इसके अलावा 8 फीसदी मराठा और मुस्लिम वोटर हैं।
कुल मिलाकर सेंधवा विधानसभा में जाति समीकरण को साधे बिना चुनाव जीतना इतना आसान नहीं है। हालांकि ऐसा नहीं है कि अंतर सिंह आर्य केवल जाति समीकरण के दम पर ही चुनाव जीत रहे हैं बल्कि उनकी जीत में कांग्रेस की गुटबाजी और आपसी खींचतान भी बड़ी वजह है। अगर कांग्रेस को यहां अपनी सीट फिर हासिल करना है तो आपसी गुटबाजी खत्म करके एक साथ चुनाव मैदान में उतरना होगा, जो फिलहाल सम्भव नजर नहीं आ रहा है।
टिकट दावेदारों की बात की जाए तो बीजेपी में जहां वर्तमान विधायक अंतर सिंह आर्य का टिकट लगभग तय माना जा रहा है।वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है। कांग्रेस से पूर्व विधायक ग्यारसीलाल रावत और पूर्व जिलाध्यक्ष सुखलाल परमार सहित करीब 10 नेता विधायक के टिकट के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं। आदिवासी बाहुल्य इस सीट पर बीएसपी भी ताल ठोंकने के लिए तैयार है।
सेंधवा में बीजेपी एक बार फिर अंतर सिंह आर्य के दम पर सीट पर कब्जा जमाने की तैयारी में जुट गई है। लेकिन इस बार उसे कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिलना तय है। हालांकि संगठन के तौर पर कांग्रेस यहां उतनी मजबूत नजर नहीं आती, जिसका खामियाजा उसे पिछले 3 विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर बीजेपी यहां अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है। हालांकि पिछले पांच सालों में जिस तरह से ये इलाका विकास की दौड़ में पिछड़ा है। इसका जवाब उन्हें देना ही पड़ेगा। लेकिन इस इलाके में बीजेपी को उनका कोई विकल्प नजर नहीं आता है या फिर ये कहा जाए कि अंतर सिंह आर्य ने पिछले 15 वर्षों में यहां एक भी आदिवासी नेता को उभरने नहीं दिया।
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वहीं दूसरी और कांग्रेस की बात की जाए तो यहां दावेदारों की लंबी फेहरिस्त पार्टी आलाकमान के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है। यहां 8 से 10 नेता विधायक पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं। हालांकि पूर्व विधायक ग्यारसीलाल रावत और पूर्व जिला अध्यक्ष सुखलाल परमार की दावेदारी सबसे मजबूत नजर आ रही है। कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष बनने से ग्यारसी लाल रावत की दावेदारी ज्यादा सशक्त है क्योंकि सुखलाल परमार अरुण यादव खेमे से हैं। शायद इसी का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और जिला अध्यक्ष पद से उन्हें कार्यमुक्त किया गया। वहीं सुखलाल परमार और जिले के बड़े नेता बाला बच्चन के बीच भी कोई खास अच्छे संबंध नहीं है। बाला बच्चन भी ग्यारसी लाल रावत के पक्ष में नजर आते हैं।
कांग्रेस के नेता भले इस बार गुटबाजी की बात को इंकार करते हुए एक साथ चुनाव लड़ने का एलान कर रहे हैं। लेकिन सेंधवा में कांग्रेस के इतिहास को देखकर लगता नहीं कि यहां टिकट बंटवारा करना पार्टी हाईकमान के लिए इतना आसान रहने वाला है। वहीं दूसरी ओर आदिवासी बाहुल्य इलाका होने के कारण यहां बीएसपी भी दावेदारी कर रही है।
जाहिर है सेंधवा के आदिवासी वोटों पर बीएसपी का भी प्रभाव रहा है। कुल मिलाकर इस सीट पर कई ऐसे सियासी समीकरण हैं जो नतीजों पर असर डालेंगे और सभी पार्टियां इन समीकरणों का साधने में लग गई हैं। यानी आने वाले चुनाव में ही साफ़ हो पाएगा कि बीजेपी जीत का सिलसिला बरकार रखती है या इस बार कांग्रेस गुटबाजी खत्म कर इस सीट पर फिर से वापसी करती है।
वेब डेस्क, IBC24