भागवत को नीट प्रदर्शन के दौरान पुलिस की लाठियां खाने वालों से बातचीत करनी चाहिए थी: शिवसेना (उबाठा)
भागवत को नीट प्रदर्शन के दौरान पुलिस की लाठियां खाने वालों से बातचीत करनी चाहिए थी: शिवसेना (उबाठा)
मुंबई, सात अगस्त (भाषा) शिवसेना (उबाठा) ने शुक्रवार को कहा कि मुंबई में ‘संघी जेन जी’ सम्मेलन करने के बजाय, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को उन प्रदर्शनकारियों से बात करनी चाहिए थी, जिन्होंने हाल ही में परीक्षा प्रश्नपत्र लीक को लेकर छात्रों के आंदोलन में हिस्सा लिया और पुलिस की लाठियां खाईं।
उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना (उबाठा) के मुखपत्र ‘सामना’ के एक संपादकीय में कहा गया कि भागवत को उन युवाओं तक भी पहुंचना चाहिए था, जो नीट पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने के कारण ‘‘झूठे’’ पुलिस मामलों का सामना कर रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख भागवत ने बृहस्पतिवार को मुंबई में एक कार्यक्रम में ‘जेन जी और जेन अल्फा’ के सदस्यों से बातचीत की और कई सवालों के जवाब दिए, जिनमें दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के हालिया आंदोलन से लेकर नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण तक के मुद्दे शामिल थे।
भागवत ने युवाओं का समर्थन करते हुए कहा था कि उनकी शिकायतें जायज हैं और जेन जी सदस्यों के विरोध-प्रदर्शन से वे देश-विरोधी नहीं बन जाते।
संपादकीय में कहा गया, ‘‘भागवत को उन लोगों से बातचीत करनी चाहिए थी, जिन्होंने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया और जो (नीट पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन के दौरान) लाठीचार्ज में घायल हुए।’’
नीट पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन, जिसका नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) ने किया था, तब हिंसक हो गया जब प्रदर्शनकारियों ने 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च किया और पुलिस से उनकी झड़प हुई। यह आंदोलन तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ समाप्त हुआ।
शिवसेना (उबाठा) ने संपादकीय में पूछा कि क्या भागवत को यह उचित लगता है कि जब युवा ‘‘तानाशाही’’ के खिलाफ सड़कों पर उतरे, तो आरएसएस चुप रहा।
मराठी दैनिक ने जोर देकर कहा, ‘‘संघी जेन जी सम्मेलन करने के बजाय, भागवत को युवाओं पर पुलिस के हमले और (नीट विरोध प्रदर्शनों के दौरान) उन पर थोपे गए झूठे मामलों को रोकना चाहिए था।’’
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी ने पूछा कि जब पिछले महीने दिल्ली में युवाओं को पुलिस की लाठियों, आंसू गैस और पैलेट गन के हमलों का सामना करना पड़ा, तो भाजपा का वैचारिक मार्गदर्शक आरएसएस क्या कर रहा था।
संपादकीय में सवाल उठाया गया कि आरएसएस तब युवाओं के समर्थन में क्यों नहीं आया?
इसमें पूछा गया, ‘‘अगर जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शनों का समर्थन करने वाले लाखों ‘जेन-जी’ युवाओं को ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहा जा रहा है, तो सरसंघचालक (आरएसएस प्रमुख) उनसे बातचीत क्यों कर रहे हैं?’’
भाषा शफीक दिलीप
दिलीप

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