मुंबई, 15 फरवरी (भाषा) महाराष्ट्र में मुंबई की एक अदालत ने एक विधि महाविद्यालय की पूर्व महिला उप-प्रधानाचार्य को फर्जी बीए की डिग्री के आधार पर संस्थान में प्रवेश लेने के 2007 के एक मामले में आरोप मुक्त कर दिया है।
अदालत ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि आरोपी महिला ने दस्तावेज के साथ छेड़छाड़ की है।
महाविद्यालय की पूर्व उप-प्रधानाचार्य के खिलाफ आरोप-पत्र इस ‘अनुमान’ के आधार पर दायर किया गया है कि उसने एक फर्जी दस्तावेज तैयार किया था।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एस्प्लेनेड कोर्ट) विनोद रामराव पाटिल ने नौ फरवरी को दिए गए फैसले में कहा कि उनके खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि चित्रा सालुंखे ने सिद्धार्थ लॉ कॉलेज में एलएलबी और एलएलएम पाठ्यक्रमों में दाखिला लेते समय कला स्नातक (बीए) की फर्जी (जाली) डिग्री का इस्तेमाल किया था।
पुलिस ने आरोप लगाया कि वह बीए परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाईं और इसलिए उन्होंने धोखाधड़ी और जालसाजी की।
इस मामले के चलते उन्हें कॉलेज के उप-प्रधानाचार्य पद से बर्खास्त कर दिया गया था।
सालुंखे ने अपने वकील के माध्यम से दावा किया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं। उन्होंने कहा कि कुछ उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारियों ने उन्हें झूठे आरोप में फंसाया है।
अदालत ने इस बात पर बल दिया कि जांच अधिकारी कथित जाली डिग्री प्रमाण पत्र को पेश करने या जब्त करने में विफल रहा।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे दूर-दूर तक यह संकेत मिले कि आरोपी ने दस्तावेज के साथ छेड़छाड़ की है।
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