सतलज को ओटीटी मंच से हटाए जाने पर तिलोत्तमा शोम: हमारे पास इसे देखने या न देखने की आजादी होनी चाहिए

सतलज को ओटीटी मंच से हटाए जाने पर तिलोत्तमा शोम: हमारे पास इसे देखने या न देखने की आजादी होनी चाहिए

सतलज को ओटीटी मंच से हटाए जाने पर तिलोत्तमा शोम: हमारे पास इसे देखने या न देखने की आजादी होनी चाहिए
Modified Date: July 10, 2026 / 04:52 pm IST
Published Date: July 10, 2026 4:52 pm IST

मुंबई, 10 जुलाई (भाषा) अभिनेत्री तिलोत्तमा शोम ने कहा है कि अभिनेता दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलज’ को ओटीटी मंच जी5 से हटाया जाना ‘‘दुखद’’ है और यह भारतीय सिनेमा में रचनात्मक स्वतंत्रता के सामने बनी हुई चुनौतियों को रेखांकित करता है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित इस फिल्म का प्रीमियर तीन जुलाई को जी5 पर हुआ था, लेकिन दो दिन बाद इसे मंच से हटा दिया गया।

बाद में सरकारी सूत्रों ने कहा था कि फिल्म को सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण हटाया गया।

शोम ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘यह वास्तव में बहुत कठिन है। किसी फिल्मकार के लिए इतनी मेहनत करने के बाद ऐसा होना बेहद दुखद है। लोकतंत्र में हमें किसी फिल्म को देखने या नहीं देखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इस मामले में हमें परिपक्वता दिखानी चाहिए। अपनी पसंद की कहानियां कहने की आजादी नहीं मिलना बहुत दुखद है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘यह केवल ‘सतलुज’ की बात नहीं है। अपनी पसंद की कहानी अपनी तरह से कहने की स्वतंत्रता शुरू से ही एक चुनौती रही है।’’

पहले ‘पंजाब ’95’ शीर्षक से बनी यह फिल्म तीन वर्ष से अधिक समय तक सेंसर बोर्ड के पास अटकी रही। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म में 127 से अधिक कट लगाने का सुझाव दिया था।

तीन जुलाई को यह फिल्म जी5 पर अपने मूल रूप में प्रदर्शित की गई लेकिन पांच जुलाई को इसे मंच से हटा लिया गया।

‘सर’, ‘लस्ट स्टोरीज़ 2’, ‘दिल्ली क्राइम 2’ और ‘पाताल लोक 2’ जैसी फिल्मों और ओटीटी श्रृंखलाओं में अपने अभिनय के लिए चर्चित शोम ने कहा कि फिल्म निर्माण हमेशा से एक जटिल प्रक्रिया रही है।

उन्होंने कहा, ‘‘फिल्म बनाना आखिर कब आसान रहा है? मैंने तो ऐसा कभी अनुभव नहीं किया। मैं समझती हूं कि यह जीवन की तरह ही जटिल प्रक्रिया है। इसमें काफी खर्च आता है, कई तरह की राय और कई पहलुओं पर विचार करना पड़ता है। हो सकता है कि मैं उनमें से हर बात को समझूं या उसका सम्मान करूं, यह जरूरी नहीं है, लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि वे मौजूद नहीं हैं।’’

इन चुनौतियों के बावजूद शोम ने कहा कि कहानियां कहने की मनुष्य की मूल प्रवृत्ति को दबाया नहीं जा सकता।

भाषा राखी रंजन

रंजन


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