Dev Diwali 2025: क्यों मनाई जाती है देव दीपावली? जान लें, इस पेड़ के नीचे रखा गया एक दीपक, कैसे खोलेगा किस्मत के द्वार?
देव दीपावली, वह त्योहार जो दीपावली की रोशनी को एक कदम आगे ले जाता है। जहां दीपावली में हम लक्ष्मी का स्वागत करते हैं, वहीं देव दीपावली देवताओं की पृथ्वी पर अवतरण होता है, इसलिए इसे "देवों की दीपावली" या "देव दीपावली" कहते हैं। आईये जानतें हैं महत्त्व और कथा..
Dev Diwali 2025 / IBC24
- 5 नवंबर 2025 को मनाई जाएगी देव दीपावली
- भगवान शिव ने इसी दिन त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था
- आंवला और पीपल के पेड़ के नीचे दीप जलाने का महत्व
Dev Diwali 2025: देव दीपावली (जिसे देव दिवाली या देव दीपावली भी कहा जाता है) हिंदू धर्म का एक पवित्र त्योहार है, जो मुख्य रूप से वाराणसी में धूमधाम से मनाया जाता है। यह कार्तिक मास की पूर्णिमा को पड़ता है, जो दीपावली के एक दिन बाद आता है।
Dev Diwali 2025: क्यों मनाई जाती है देव दीपावली ?
2025 में देव दीपावली 5 नवंबर (बुधवार) को मनाई जाएगी। यह कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को आती है। प्रदोषकाल मुहूर्त शाम 5:15 बजे से 7:50 बजे तक रहेगा, जिसमें दीप दान और आरती का विशेष महत्व है। वाराणसी मे यह त्योहार गंगा घाटों पर लाखों दीयों की रोशनी से जगमगा उठता है।
महत्त्व एवं कथा
देव दीपावली का महत्व भगवान शिव की विजय से जुड़ा है। माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन देवतागण दिवाली मनाते हैं व इसी दिन देवताओं का काशी में प्रवेश हुआ था। मान्यता है की तीनों लोको मे त्रिपुराशूर राक्षस का राज चलता था देवतागणों ने भगवान शिव के समक्ष त्रिपुराशूर राक्षस से उद्धार की विनती की। भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन राक्षस का वध कर उसके अत्याचारों से सभी को मुक्त कराया और त्रिपुरारि कहलाये। इससे प्रसन्न देवताओं ने स्वर्ग लोक में दीप जलाकर दीपोत्सव मनाया था तभी से कार्तिक पूर्णिमा को देवदीवाली मनायी जाने लगी।
काशी में देवदीवाली उत्सव मनाये जाने के सम्बन्ध में मान्यता है कि राजा दिवोदास ने अपने राज्य काशी में देवताओं के प्रवेश को प्रतिबन्धित कर दिया था, कार्तिक पूर्णिमा के दिन रूप बदल कर भगवान शिव काशी के पंचगंगा घाट पर आकर गंगा स्नान कर ध्यान किया, यह बात जब राजा दिवोदास को पता चला तो उन्होंने देवताओं के प्रवेश प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया।
इस दिन सभी देवताओं ने काशी में प्रवेश कर दीप जलाकर दीपावली मनाई थी। इसलिए दीप जलाकर गंगा नदी की पुजा की जाती है और गंगा को माँ का सम्मान दिया जाता है। वाराणसी में इसे ‘त्रिपुरी पूर्णिमा’ भी कहा जाता है, जहां देवी-देवता गंगा में स्नान करते हैं। मान्यता है कि देव दीपावली के दिन देवता स्वर्ग से उतरकर धरती पर आते हैं और दिवाली का उत्सव मनाते हैं। सूर्यास्त के बाद जब आकाश में पूर्ण चंद्रमा मुस्कुराता है, और अचानक लाखों मिट्टी के दीये एक साथ सांस लेने लगते हैं। गंगा की लहरें उनमें झिलमिलाती हैं, घंटियों की ध्वनि मंत्रों में बदल जाती है, और दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती की लपटें देवलोक की सीढ़ी बन जाती हैं। यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं, बल्कि वाराणसी की देव दीपावली है।
मान्यता है कि देव दिवाली यानी ‘देवताओं की दिवाली’ यह स्वर्ग में नहीं बल्कि धरती पर एक खास जगह पर होती है। इस दिन विधिपूर्वक दीप दान करने का भी एक खास महत्व होता है कहा जाता है कि इस दिन इन जगहों पर दीप जलाया जाए तो घर में कभी भी पैसों की किल्लत नहीं आती और भगवान की कृपा सदैव बनी रहती है।
Dev Diwali 2025: इस वृक्ष के नीचे दिया जलाएं
देव दीपावली के दिन सबसे पहला दिया घर के मंदिर में जलाना चाहिए। फिर यदि हो सके तो घर के आसपास किसी ब्राह्मण के घर के बहार दिया जलाएं। देव दिवाली पर पीपल के वृक्ष और आंवला के वृक्ष के नीचे दीपक जलाना शुभ माना जाता है, ऐसा माना जाता है कि आंवले के पेड़ में भगवान विष्णु, शिव और अन्य देवताओं का वास होता है। आंवले के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से भगवान विष्णु और शिवजी प्रसन्न होते हैं, और यह देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का एक तरीका है।
आइए, देव दिवाली की इस दिव्य रात्रि में देवताओं का स्वागत करें और जीवन को रोशन बनाएं!
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