Karwa Chauth Vrat Katha/Image Credit: ScreenGrab / Google / @Canva
Karwa Chauth Vrat Katha: ‘करवा चौथ‘ सुहागिन महिलाओं का एक बेहद पवित्र त्योहार है, जो पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह पवित्र पर्व 29 अक्टूबर, गुरुवार को श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। यह महापर्व पति की दीर्घायु, आरोग्यता, समृद्धि और सुखद पारिवारिक जीवन की कामना के लिए रखा जाने वाला एक कठिन निर्जला व्रत है।
इस दिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक बिना पानी और भोजन के रहती हैं। सुबह शुरू होने वाला यह उपवास रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही खोला जाता है।
‘करवा चौथ 2026‘ का धार्मिक महत्व बहुत गहरा है। इसका नाम मिट्टी के बर्तन यानी “करवा” और चतुर्थी तिथि यानी “चौथ” को जोड़कर बना है। प्राचीन काल में यह पर्व मूल रूप से मिट्टी के उस कलश का प्रतीक था, जो जीवनदायिनी नदियों के जल, समृद्ध फसल और राष्ट्र की रक्षा करने वाले सैनिकों की सुरक्षा से जुड़ा था।। बदलते समय के साथ, आज यह महापर्व पति-पत्नी के वैवाहिक रिश्ते को मजबूत करने और उनके अटूट प्रेम व विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।
बहुत समय पहले की बात है, इंद्रप्रस्थपुर नामक शहर में ‘वेदशर्मा’ नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। उनका विवाह लीलावती से हुआ था। उनके सात सुयोग्य पुत्र और ‘वीरावती’ नाम की एक गुणवान पुत्री थी। सात भाइयों की अकेली बहन होने के कारण वीरावती अपने माता-पिता और भाइयों की बेहद लाडली थी।
जब वीरावती विवाह के लायक हो गई, तब उसका विवाह एक सुयोग्य ब्राह्मण युवक से कर दिया गया। शादी के पश्चात जब वह मायके आई, तो उसने अपनी भाभियों के साथ पति की लम्बी आयु के लिए ‘करवा चौथ का व्रत‘ रखा। लेकिन, व्रत के कड़े नियमों के बीच वह भूख-प्यास सहन नहीं कर पाई और कमज़ोरी की वजह से अचानक चक्कर खाकर ज़मीन पर गिर गई।
अपनी लाड़ली बहन की यह दयनीय हालत भाईयों से देखी नहीं जा रही थी। वे भली-भाँती जानते थे कि वीरावती एक सच्ची पतिव्रता है और चाहे वह अपने प्राण त्याग देगी लेकिन चन्द्रदर्शन किए बिना अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं डालेगी। इसलिए, बहन की जान बचाने के लिए सभी भाइयों के मिलकर एक तरकीब निकाली।
योजना के अनुसार, एक भाई दूर एक बरगद के पेड़ पर छलनी और जलता हुआ दीया लेकर चढ़ गया ताकि चांद जैसी रोशनी दिखाई दे। इधर, जैसे ही वीरावती को होश आया, उसके बाकी भाइयों ने उससे कहा, “देखो बहन! चांद निकल आया है।” इसके बाद वे उसे छत पर ले गए ताकि वह बनावटी चंद्रमा के दर्शन कर अपना व्रत खोल सके।
दूर बरगद के पेड़ पर छलनी के पीछे चमकते दीपक को देखकर वीरावती को विश्वास हो गया कि चंद्रमा सचमुच निकल आया है। भूख से बेहाल वीरावती ने बिना सोचे-समझे उस दीपक को ही असली चांद मान लिया और उसे अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल लिया। लेकिन जैसे ही उसने भोजन का पहला निवाला मुंह में डाला, उसे एक के बाद एक अशुभ संकेत मिलने लगे।
जैसे ही उसने पहला निवाला (कौर) मुँह में लिया, उसमें बाल निकला; दूसरे निवाले पर किसी ने छींक दिया और तीसरे निवाले के साथ ही उसे ससुराल से बुलावा आ गया। जब वह व्याकुल होकर पहली बार अपने ससुराल पहुँची, तो वहाँ का दृश्य देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई, सामने उसके पति का मृत शरीर पड़ा था।
पति के मृत शरीर को देखते ही वीरावती फूट-फूटकर रोने लगी। वह खुद को कोसते हुए सोचने लगी कि व्रत के दौरान अवश्य ही उससे कोई बड़ी भूल हुई है। जब वह ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगी, तो उसकी आवाज़ सुनकर इंद्रदेव की पत्नी देवी इंद्राणी उसे दिलासा देने के लिए वहाँ पहुंची।
रोती-बिलखती वीरावती ने देवी इंद्राणी से पूछा आखिर करवा चौथ के दिन ही उसके पति की मौत क्यों हुई? वह उनसे अपने पति को दोबारा जिंदा करने की भीख मांगने लगी। वीरावती को दुखी देख देवी इंद्राणी ने उसे बताया, तुमने चांद को अर्घ्य दिए बिना ही नकली रोशनी देखकर व्रत तोड़ दिया था, इसी वजह से तुम्हारे पति की अचानक मृत्यु हुई है। इसके बाद देवी ने उसे वर्ष भर आने वाली प्रत्येक माह की चौथ (चतुर्थी) का व्रत रखने की सलाह दी और उसे भरोसा दिलाया कि ऐसा करने से उसका पति वापस जीवित हो जाएगा।
इसके बाद वीरावती ने पूरे भरोसे के साथ हर महीने का व्रत रखना और पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया। आखिरकार, उसकी इस सच्ची भक्ति और व्रतों के पुण्य से उसका पति दोबारा जिंदा हो गया और उसे अपनी ज़िंदगी वापस मिल गई।
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