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#ATAL_RAAG_आइए इस रेडियो नाटक के जरिए हिंदू नववर्ष के बारे में जानते हैं

हिंदू नववर्ष ~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल दृश्य …शहर का प्रसिद्ध सिद्धिदात्री मंदिर, जहां दीनानाथ अपने पोते-पोतियों – अभय,निर्भय , सिद्धि और श्रेष्ठ के साथ पूजा करने गए हुए हैं… मंदिर …

#ATAL_RAAG_आइए इस रेडियो नाटक के जरिए हिंदू नववर्ष के बारे में जानते हैं
Krishnamurari Tripathi Atal
Published: 18 Mar 2026 | 6:52 pmModified: 18 Mar 2026 | 6:52 pm

हिंदू नववर्ष

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

 

दृश्य ...शहर का प्रसिद्ध सिद्धिदात्री मंदिर, जहां दीनानाथ अपने पोते-पोतियों – अभय,निर्भय , सिद्धि और श्रेष्ठ के साथ पूजा करने गए हुए हैं...

मंदिर में धीमे मद्धिम स्वर से ----ओम जय अम्बे गौरी बज रहा है..घंटियों की धुन और श्रद्धालुओं की चहल-पहल की आवाजें गूंज रही हैं।

पंडित जी – कैसे हैं दीनानाथ जी, नववर्ष मंगलमय हो, जय माई की...

दीनानाथ – पंडित जी प्रणाम , आपको भी नए साल की शुभकामनाएं । माता रानी की कृपा हम सब पर बनी रहे।

पंडित जी – ये नन्हें – मुन्ने बच्चों की टोली भी आपके साथ आई है..चलो बच्चो इधर आओ , माता रानी का दर्शन कर प्रसाद लो...

दीनानाथ – बच्चों पंडित जी को प्रणाम करो और वे जैसा कहें वैसा करो...

सभी बच्चे एक स्वर में ...जी दादाजी..

सभी बच्चे सामूहिक स्वर में दादाजी से पूछते हैं...- दादाजी आज आप नए साल की शुभकामनाएं दे रहे थे.. लेकिन नया साल तो 1 जनवरी को आता है न..फिर आज ये न्यू ईयर कैसे आया?

दीनानाथ – बच्चो यही तो आज की समस्या है । अंग्रेज तो वर्षों पहले चले गए लेकिन अंग्रेजियत का बोझा हमारे सिर डाल गए। अब क्या कहें..ना जाने कब तक अंग्रेजी दासता का ये बोझ लदा रहेगा।

पंडित जी – क्या बात है दीनानाथ जी। आखिर बच्चों से कौन सा संवाद जारी है?

दीनानाथ – पंडित जी, ये बच्चे नए वर्ष के बारे में जानना चाह रहे थे। अब आप ही इन बच्चों को समझाइए कि - आज नया वर्ष कैसे है.

पंडित जी – अच्छा बच्चो तो ये बात है...तो बच्चो आओ मंदिर के पीछे के चबूतरे में हम सब बैठते हैं और जानते हैं – अपना नववर्ष ....

बच्चों का सामूहिक स्वर --- जी पंडित जी...
चबूतरे के पास सभी जाकर बैठ जाते हैं....[ साउन्ड }

पंडित जी – तो बच्चों किसको- किसको नववर्ष के बारे में जानना है?

सामूहिक स्वर में – हम सबको जानना है...
पंडित जी – बच्चो ऐसा है कि भगवान ब्रम्हा ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से इस संसार का निर्माण शुरू किया था। तभी से इसका नाम सृष्टि संवत्सर हो गया।

अभय – पंडित जी आपने ठीक बताया लेकिन क्या इतना ही है ?

पंडित जी – सही सवाल पूछा बिटवा तुमने. बसंत पंचमी से चारो ओर कोई परिवर्तन देखा है?

निर्भय - हां, पंडित जी पौधों में नई-नई पत्तियां आने लगी हैं । आमो में बौर आने लगे है। नई फसल किसानों के घरों में आ रही है।

 

पंडित जी - शाबाश बेटे । यही तो नयापन है क्योंकि हमारे नववर्ष में हमारी प्रकृति नई होने लगती है।

सिद्धि – पंडितजी लेकिन न्यू ईयर तो 1 जनवरी से ही आता है न...हम इसे कैसे याद रखेंगे..

पंडितजी – बेटी , सिद्धि हमारे पुरखे बड़े विद्वान थे, वे ऋषि महर्षि और वैज्ञानिक थे...उन्होंने सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र , ग्रह सबकी गणना की और कालखंड की रचना की...

श्रेष्ठ – तो पंडितजी हमें बताइए हम कैसे जानेंगे कि हमारा नवर्ष कब और कैसे मनाया जाए...

पंडितजी – हमारे यहां पंचाग होता है जिसमें तिथि , नक्षत्र, दिन सबकी गणना होती है और शुभकार्य उसी हिसाब से संपन्न होते हैं।

सिद्धि – हां पंडितजी , हमारी दादी तो एक वीक पहले ही बता रही थी कि – चैत्र नवरात्रि आने वाली है। इतना ही नहीं पंडितजी दादी तो अपनी अंगुलियों से ही हर तिथि गिनती रहती हैं।‌ फिर वो फटाफट बता देती हैं कि कौन सी डेट को कौन सी तिथि है।

पंडितजी – बिल्कुल सही बेटी । यही हमारी विशेषता है। यही सब चीजें तो हर भारतवासी अपने महान पूर्वजों से पीढ़ी दर पीढ़ी सीखता रहा आया है।

श्रेष्ठ : पंडित जी लेकिन आप ये बताइए आप जो चैत्र बोल रहे थे। इस तरह महीनों के नाम कैसे पड़े ?

पंडित जी : बहुत बढ़िया सवाल किया है। बच्चो बात ये है कि हमारी पूरी सनातनी हिंदू संस्कृति वैज्ञानिक आधार पर बनी है। इसीलिए माहों (मासों) का नामकरण नक्षत्रों के नाम पर हुआ। इसके लिए हमारे पूर्वजों ने व्यवस्था दी कि - जिस मास में जिस नक्षत्र में चन्द्रमा पूर्ण होगा
वह महीना उसी नक्षत्र के नाम से जाना जाएगा। और इस पद्धति के अनुसार — चैत्र - चित्रा, वैशाख - विशाखा, ज्येष्ठ - ज्येष्ठ, अषाढ़ - अषाढ़ा, श्रावण - श्रवण, भाद्रपद -भाद्रपद, अश्विन - आश्विनी , कार्तिक - कृतिका, मार्गशीर्ष - मृगशिरा, पौष - पुष्य, माघ- मघा, फाल्गुन - फाल्गुनी ; आदि के आधार पर महीनों नामकरण किया गया है।

श्रेष्ठ : पंडितजी , आपने जो हमें बताया। ये तो आज अगर हम दादाजी के साथ मंदिर न आते तो हमें पता ही नहीं चलता।

पंडित जी : हां, बच्चो और इतना ही नहीं। हमारी उसी ज्योतिष की वैज्ञानिक गणना का असर ये है कि - पंचांग में जब जिस दिन, जिस समय सूर्य और चंद्र ग्रहण की बात लिखी होती है। ठीक उसी जगह और उतने ही समय पर सूर्य और चंद्र ग्रहण होता है। आज इसे बड़े से बड़े वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है।

पंडित जी की बातें सुनकर सभी बच्चे खुशी से झूमते हुए तालियां बजाने लगते हैं...

दीनानाथ : पंडित जी ये बच्चे बड़े शैतान हैं। आपको परेशान कर रहे हैं।

पंडित जी : नहीं.. नहीं.. मुझे तो ये बच्चे बहुत प्रिय हैं। आज की नई पीढ़ी अपनी परंपराओं और संस्कृति के बारे में जानना चाहती है। ये बहुत बड़ी बात है। आपके परिवार के संस्कारों का सुफल है दीनानाथ जी..

दीनानाथ : सब माई की कृपा और बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद है।

पंडित जी : तो बच्चो नवरात्रि में शक्ति के रूप में चैत्र प्रतिपदा से कन्या का पूजन करना। मां जगदंबा की आराधना करना। हमारी उसी महान परंपरा की विरासत है।

अभय : सचमुच में पंडित जी। नवरात्रि के नौ दिन बहुत अच्छा लगता है। घर में माँ , दादी और सब लोग उपवास रखते हैं और हम सब मिलकर दुर्गा मैया की पूजा करते हैं।

निर्भय – पंडितजी लेकिन आज तो सबकोई नववर्ष नहीं मनाता न?‌

पंडितजी- जो समझदार हैं वे सभी अपना नवर्ष मनाते हैं। इतना ही नहीं देश भर में अपना नववर्ष विभिन्न रूपों में मनाया जाता है।

अभय – अच्छा पंडितजी ऐसा है...क्या आप हमें बताएंगे कि अपने देश में नवर्ष कहां और किस रूप में मनाया जाता है?

– पंडितजी - हां बिटवा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में इसे आदिपर्व तो कश्मीर में नवरेह के रूप में मनाते हैं...वहीं असम में बिहू के रूप में, मणिपुर में सजीबू नोगमा , तमिलनाडु में पुतुहांडु, केरल में विशु, और महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा मनाते हैं।

सिद्धि – पंडितजी आपने तो हमारी आंखें खोल दी... बहुत इंट्रेस्टिंग जानकारी आपने दी। हमें नववर्ष के बारे में और बताइए न..मैं तो पक्का अपने सारे दोस्तों को बताऊंगी।

– पंडितजी – बेटी, पंजाब में नववर्ष को बैसाखी तो बंगाल में नबा बरसा के रूप में मनाया जाता है....और शेष भारत में नवसंवत्सर , विक्रम संवत्सर के रूप में मनाया जाता है।

श्रेष्ठ – पंडितजी , दादाजी तो बता रहे थे कि हिंदू नववर्ष का अपने आप में बड़ा इतिहास रहा है...अब आप इसके बारे में बताइए न..?

– पंडितजी – हां बेटा, दीनानाथजी ठीक ही कहते हैं.। 14 साल के वनवास के बाद भगवान राम का राज्याभिषेक भी चैत्र प्रतिपदा की तिथि को ही हुआ था।वहीं युधिष्ठिर के राज्याभिषेक की भी यही तिथि है। इसीलिए इसका बड़ा महत्व है।

निर्भय – अच्छा , पंडितजी फिर नववर्ष को विक्रम संवत क्यों कहते हैं.?

पंडितजी – वह इसलिए कि न्यायप्रिय शासन के पर्याय सम्राट विक्रमादित्य ने चैत्र प्रतिपदा की तिथि से ही विक्रम संवत का प्रारंभ किया था। जोकि वर्तमान में भारतीय जन जीवन में दिखाई देता है।

अभय – पंडितजी हम सब तो कितने अनजान थे ,आज तो आपने हमें ढेर सारी बातें बताई...क्या हिंदू नववर्ष के बारे में और कुछ जानकारी है जो आप हम सभी को बताना चाहेंगे?

पंडितजी – दीनानाथ जी आपके पोते-पोती ते बहुत ही समझदार हैं। इनकी जिज्ञासा तो मेरा मन मोह ले रही है।

दीनानाथ - सब ईश्वर की कृपा और आप सभी बड़ों का आशीर्वाद है....

पंडित जी – बच्चों अब कुछ बातें और जान लीजिए। इसके बाद अभी कोई जानकारी नहीं दी जाएगी....अब, हम सब मिलकर सीधे माता रानी की प्रार्थना करेंगे।

सामूहिक स्वर में – बिल्कुल पंडितजी....

पंडितजी – तो बच्चो , आज की तिथि को ही महर्षि दयानंद ने आर्यसमाज की स्थापना की थी।‌हमारे सिख धर्म के पांचवें गुरु अर्जुनदेव का जन्मपर्व आता है । साथ ही विश्व के सबसे बड़े समाजसेवी संगठन, RSS यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक – डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी चैत्र प्रतिपदा को ही हुआ था।

दीनानाथ – तो बच्चो आप सभी को सबकुछ पता लग गया न -अपने नववर्ष के बारे में। देखा न बच्चो अपना नववर्ष कितना वैज्ञानिक और महान है.।

सामूहिक स्वर – हां दादाजी.....

पंडित जी : दीनानाथ जी, चलते-चलते मैं तो ये बताना भूल ही गया था। बच्चो अपना हिंदू नववर्ष यानी भारतीय नववर्ष अंग्रेजी गेग्रोरियन कैलेंडर से 57 साल आगे चलता है। यानी इस साल जो अंग्रेजी साल हो उसमें 57 साल जोड़ देना। हम कालगणना में इतना आगे हैं।

बच्चों का सामूहिक स्वर.. पंडित जी हमारा नववर्ष महान है..महान है..

पंडित जी – तो चलिए अब माता रानी की स्तुति करते हैं.....

अंतिम दृश्य – सभी के चलने की आहट और सामूहिक स्वर में दुर्गा स्तुति....अंबे तू है जगदंबे काली ..ये आरती गूंजती है। और शंख, घंटा ध्वनि के नाद के साथ सब भगवती जगदंबा की स्तुति में लीन हो जाते हैं।

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

#atalraag #अटलराग #hindu #HinduNavVarsh

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Web Title: Let's learn about the Hindu New Year through this radio play BY KRISHNAMURARI TRIPATHI ATAL

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