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#ATAL_RAAG_अब नहीं पनपेंगे माओवादी : जरा याद इन्हें भी कर लो

अब नहीं पनपेंगे माओवादी : जरा याद इन्हें भी कर लो —कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल देश से सशस्त्र माओवादी आतंक का खात्मा हो गया है। लेकिन अर्बन नक्सलियों का माड्यूल अभी …

#ATAL_RAAG_अब नहीं पनपेंगे माओवादी : जरा याद इन्हें भी कर लो
Krishnamurari Tripathi Atal
Published: 06 Apr 2026 | 8:16 pmModified: 06 Apr 2026 | 8:22 pm
HIGHLIGHTS
  1. दंतेवाड़ा क्षेत्र में हमले के समय डीआईजी रहे आईपीएस कल्लूरी ने जेनएयू में हमले के बाद हुए जश्न की चर्चा करते हुए कहा था —“मुझे काफी दुःख पहुँचा था जब मुझे यह पता चला कि जेनएयू में (कुछ विद्यार्थियों द्वारा) ताड़मेटला में 76 बलिदानी जवानों के बलिदान का जश्न मनाया गया।”
  2. इस घटना को अर्बन नक्सली कही जाने वाली अरुंधति राय की पुस्तक, रिपोर्टिंग के लिए भी देखा जाना चाहिए। क्योंकि इस घटना वाले दिन से अगले— 19 दिन तक अरुंधति राय दंतेवाड़ा में रुकीं। उन्होंने एक रिपोर्ट बनाई थी, जो सेना, प्रशासन और छत्तीसगढ़ सरकार के विरोध में थी।
  3. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि — “ यह अर्बन नक्सल खुद हाथ में हथियार नहीं लेना चाहते, लेकिन गरीबों के हाथ में हथियार देकर अपनी विचारधारा फैलाना चाहते हैं। मगर उनके भी दिन लद गए हैं। ”

अब नहीं पनपेंगे माओवादी : जरा याद इन्हें भी कर लो

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

—कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

देश से सशस्त्र माओवादी आतंक का खात्मा हो गया है। लेकिन अर्बन नक्सलियों का माड्यूल अभी भी सक्रिय है। नक्सलवाद-माओवाद के ख़ूनी पंजों ने चारो ओर कैसे दहशत फैला रखी थी? उसकी गवाह हर वो तारीख़े हैं जब-जब हमारे वीर जवानों ने माओवादियों से लोहा लिया। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में, बस्तर में सुख-शांति के लिए अपना बलिदान दे दिया। ऐसी ही इतिहास की एक तारीख़ है 6 अप्रैल 2010।
ये तारीख़ याद कर लीजिए। ये वो तारीख़ थी जब दंतेवाड़ा में CRPF की 62 वीं बटालियन पर घात लगाकर माओवादी आतंकियों ने हमला किया था। सुकमा (तत्कालीन दंतेवाड़ा) के चिंतागुफा, ताड़मेटला के पास माओवादियों ने क्रूरता की अति कर दी थी। लेकिन जवानों का हौसला कम नहीं था। माओवादियों के साथ हुए संघर्ष में 76 जवानों ने अपना बलिदान दे दिया था। CRPF ने वीर बलिदानियों को याद करते हुए लिखा —“हमारे 75 श्रेष्ठ जवानों ने 6 घंटे तक चले भीषण संघर्ष में 7 माओवादियों को ढेर किया और 8 को घायल किया, इसके बाद उन्होंने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। 500 से अधिक भारी हथियारों से लैस माओवादियों और सैकड़ों IEDs से घिरे होने के बावजूद—जो लगभग हर उस स्थान पर लगाए गए थे। जहाँ हमारे जवान शरण लेकर जवाबी कार्रवाई कर सकते थे। उनका साहस अद्वितीय और अविस्मरणीय था।हमारे कुछ वीरों ने अपने साथियों की रक्षा करने और दुश्मन को निष्क्रिय करने के लिए ग्रेनेड पर लेटकर सर्वोच्च बलिदान दिया। अंतिम क्षणों में भी वीर सैनिकों ने अपने हथियार अपने नीचे छिपा लिए। ”

 

इस क्रूर हमले का मास्टरमाइंड माडवी हिड़मा था। इसके बाद जेएनयू में अर्बन नक्सलियों ने जश्न मनाया था। दंतेवाड़ा क्षेत्र में हमले के समय डीआईजी रहे आईपीएस कल्लूरी ने जेनएयू में हमले के बाद हुए जश्न की चर्चा करते हुए कहा था —“मुझे काफी दुःख पहुँचा था जब मुझे यह पता चला कि जेनएयू में (कुछ विद्यार्थियों द्वारा) ताड़मेटला में 76 बलिदानी जवानों के बलिदान का जश्न मनाया गया।”

साथ ही छत्तीसगढ़ के कांकेर समेत कई अलग-अलग इलाकों में अर्बन नक्सलियों ने जवानों के बलिदान पर जश्न मनाया।‌ इस घटना को अर्बन नक्सली कही जाने वाली अरुंधति राय की पुस्तक, रिपोर्टिंग के लिए भी देखा जाना चाहिए। क्योंकि इस घटना वाले दिन से अगले— 19 दिन तक अरुंधति राय दंतेवाड़ा में रुकीं। उन्होंने एक रिपोर्ट बनाई थी, जो सेना, प्रशासन और छत्तीसगढ़ सरकार के विरोध में थी। अब आप सोचिए कि जहां एक ओर हमारे 76 जवानों का बलिदान हो गया। वहीं दूसरी ओर अर्बन नक्सली। इसे जीत के तौर पर देख रहे थे। भारत के ख़िलाफ़ छेड़े गए सशस्त्र युद्ध के इस घटनाक्रम पर जश्न मना रहे थे। सेना, पुलिस और सरकार के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा वाली रिपोर्टिंग की जा रही थी। उन्हें खलनायक बताया जा रहा था। जबकि माओवादी आतंकियों की रहनुमाई की जा रही थी।‌ क्योंकि अर्बन नक्सलियों के लिए माओवादियों के द्वारा जवानों की हत्या—जीत थी।‌ इसे वो बड़े माड्यूल के तौर पर फैलाना चाहते थे।

कश्मीर नरसंहार के आरोपी यासीन मलिक के साथ अरुंधति राय

कश्मीर नरसंहार के आरोपी यासीन मलिक के साथ अरुंधति राय

ये ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि अर्बन नक्सलियों और सशस्त्र माओवादियों में कोई विशेष अंतर नहीं है। ये दोनों न तो देश के संविधान को मानते हैं। न ही इनमें राष्ट्र के प्रति कोई निष्ठा है। इनका हमेशा से एक ही उद्देश्य रहा है कि - कैसे भारत में रक्तपात किया जाए। 'जल-जंगल, जमीन' के नाम पर हिंसा की जाए। ये दोनों जनजातीय समाज के, वनवासियों के घोर शत्रु हैं।अर्बन नक्सलियों और सशस्त्र माओवादियों के रक्तपात के चलते ही— सुदूर वनांचल क्षेत्र विकास से बहुत पीछे रह गए। हालांकि जैसा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि — “ यह अर्बन नक्सल खुद हाथ में हथियार नहीं लेना चाहते, लेकिन गरीबों के हाथ में हथियार देकर अपनी विचारधारा फैलाना चाहते हैं। मगर उनके भी दिन लद गए हैं। ”

ये कथन इस बात की प्रतिपुष्टि करता है कि हथियारबंद माओवादियों के बाद अगला नंबर अर्बन नक्सलियों का है। जो भी भारत की अखंडता, संप्रभुता और संविधान के ख़िलाफ़ आएगा। वो बख़्शा नहीं जाएगा। मातृभूमि भारतभूमि को हम रक्तरंजित नहीं होने दे सकते।

हमारे वीर जवानों ने सुरक्षा के लिए जिस अदम्य साहस का परिचय दिया है। वर्षों तक माओवादियों की मांद में घुसकर उन्हें नेस्तनाबूद किया है।आज उन वीर बलिदानियों के कारण ही छत्तीसगढ़ ख़ूनी आतंक से बाहर आया है। सशस्त्र माओवादी आतंक का सफाया हो चुका है। अर्बन नक्सली हमेशा से हथियारबंद माओवादियों की ढाल बनकर खड़े रहते थे। अभी भी ये सिलसिला रुका नहीं है।

अर्बन नक्सली —नक्सलवाद के समर्थन में साहित्य लिखते, इंटरव्यू करते, एडिटोरियल लिखते, नाट्य मंचन करते, ढफली बजाते, रैली करते और चिंघाड़ते हुए अर्बन नक्सली नज़र आते थे।‌ ये मानवाधिकार
के नाम पर माओवादी हिंसा को जायज़ ठहराते थे। लेकिन माओवादी आतंकी जिन निर्दोषों की हत्या करते थे। उनके मानवाधिकार पर ये चुप्पी ओढ़ लेते थे। वो माओवादी जो बस्तर के जनजातीय समाज का दमन करते थे। स्थानीय लोगों के जवान बच्चों और महिलाओं को अर्बन नक्सलियों के कॉन्सेप्ट पर उठा ले जाते थे। फिर उनके हाथों में हथियार थमा देते थे। रक्तपात कराते थे। बस्तर के वो बच्चे जिन्हें हाथों में किताबें थामनी थी। अर्बन नक्सलियों, माओवादियों ने - उन्हें बंदूक पकड़ने के लिए मजबूर किया। उनका बचपन, घर-परिवार और समाज सबकुछ छीन लिया। बारूदी गंध की ज़िंदगी जीने को विवश किया। भोले-भाले, सरल हृदय जनजातीय समाज को अपने ही समाज का दुश्मन बना दिया। माओवादियों ने उन्हें रक्तपात करने का हथियार बनाने का जघन्य अपराध किया। क्या इनसे किसी भी प्रकार की सहानुभूति की दिखाई जा सकती है ?

Priti Majhi Post on Maoist Leader Hidma

आज जिस माडवी हिड़मा को अर्बन नक्सली हीरो बना रहे हैं। अर्बन नक्सली जिस हिड़मा के लिए नारे लगा रहे हैं। मत भूलिए कि वो आतंकी इन 76 जवानों की हत्या का असल मास्टरमाइंड था। माडवी हिड़मा वो खूंखार आतंकी था जिसने न जाने कितने घर-परिवार उजाड़ दिए। न जाने कितने निर्दोषों को गोली से भून दिया।‌ नृशंसता के साथ सिलसिलेवार ढंग से हत्याओं को अंज़ाम दिया। अब, उस हिड़मा को महान बलिदानी भगवान बिरसा मुंडा से जोड़ने का अपराध , अर्बन नक्सली कर रहे हैं। बिरसा मुंडा जिन्होंने राष्ट्रीय अस्मिता के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। ईसाई मिशनरियों, अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया। स्वतंत्रता, जनजातीय अस्मिता, भारत की संस्कृति और कन्वर्जन के ख़िलाफ़ जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। अगर कोई भी भगवान बिरसा मुंडा से हिड़मा जैसे माओवादी क्रूर हत्यारे को जोड़ता है तो ये सबसे बड़ा अपराध है। यह हमारे आदर्शों, हमारी संस्कृति, जनजातीय समाज का घोर अपमान है। ये किसी भी क़ीमत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अब भी जो लोग माओवाद के समर्थन में लोगों को बरगलाते दिखाई दें। जो हिड़मा जैसे माओवादी आतंकी को ग्लोरीफाई करते दिखें। जो ये विमर्श करते दिखें कि— अजी ! जल-जंगल जमीन के लिए नक्सलवाद फिर से वापस आ सकता है। ऐसे में ये तय मानिए कि या तो ये अर्बन नक्सली हैं। याकि ये अर्बन नक्सलियों के नैरेटिव के ट्रैप में फंस गए हैं। याकि ये किसी पॉलिटिकल लाइन को एड्रेस कर रहे हैं। देश समेत छत्तीसगढ़ से माओवादी आतंक का सफ़ाया ये बता रहा है कि - अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो। संकल्प हो। समाज के लिए बेहतरी की चिंता हो तो कोई भी लक्ष्य कठिन नहीं हो सकता है। हमारे सुरक्षाबल, हमारे गौरव है। उनके असंख्य बलिदानों के प्रति ये राष्ट्र और समाज अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। हमारा छत्तीसगढ़, हमारे बस्तर की माटी और उसकी संतानें अब सृजन का नया विहान रच रही हैं। अब बस्तर में बारूद की गंध कभी नहीं लौटेगी। हमारा पूरा समाज-एक साथ खड़ा है। बस्तर के युवाओं के कंधों पर अब वहां की शिक्षा-रक्षा, स्वास्थ्य-रोजगार, विकास की कमान है। जो अभावग्रस्त हैं। उन तक अब सारे संसाधन तेजी से पहुंचेंगी। वीर गुंडाधुर, भगवान बिरसा मुंडा, दंतेश्वरी माई की संतानें अब मूल को पहचानकर सृजन के गीत गा रही हैं। प्रकृति की लय ताल के साथ एकाकार होकर शांत और सुरम्य तस्वीरें रच रही हैं।

— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।

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Web Title: Now Maoists Will No Longer Rise: Zara Yaad Inhein Bhi Kar Lo By Krishna Murari Tripathi Atal

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