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राष्ट्रीय चेतना का प्रसार और सांस्कृतिक पाले का रूपांतरण

राष्ट्रीय चेतना का प्रसार और सांस्कृतिक पाले का रूपांतरण देश का परिवेश—दरवेश—अब केवल बदल नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय शक्तियों की विचारधारा से ओतप्रोत होकर एक नए सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर …

राष्ट्रीय चेतना का प्रसार और सांस्कृतिक पाले का रूपांतरण
Krishnamurari Tripathi Atal
Published: 13 Apr 2026 | 2:43 pmModified: 13 Apr 2026 | 2:43 pm
HIGHLIGHTS
  1. भारतीय सिनेमा और कला जगत लंबे समय तक एक खास वैचारिक घेरे में बँधकर रह गया था। राष्ट्र, धर्म, इतिहास, परंपरा—इन शब्दों का प्रयोग भी “असहजता” से भर देता था। लेकिन आज— फ़िल्मकार भारतीय पराक्रम, नायकों और सभ्यता पर केंद्रित कथाएँ लिख रहे हैं।
  2. भारतीय मीडिया लंबे समय तक पश्चिमी टेम्प्लेट में फँसा रहा। राष्ट्रवादी चेतना को “कट्टरता” और “अंधराष्ट्रवाद” जैसे नाम देकर छिपाया गया। लेकिन अब— युवा पत्रकार इतिहास और संस्कृति पर तथ्यपूर्ण सामग्री ला रहे हैं,रिपोर्टिंग में जमीनी भारत की उपस्थिति बढ़ी है, और भारत-केंद्रित दृष्टि (India-centric worldview) को स्वीकार्यता मिल रही है। मीडिया भी समझ रहा है कि नई पीढ़ी किसी थोपे हुए एजेंडा के नहीं—अपने मूल्यों के साथ खड़ी पत्रकारिता को स्वीकार करती है।

राष्ट्रीय चेतना का प्रसार और सांस्कृतिक पाले का रूपांतरण

 

देश का परिवेश—दरवेश—अब केवल बदल नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय शक्तियों की विचारधारा से ओतप्रोत होकर एक नए सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर अग्रसर है।यह परिवर्तन न तो आकस्मिक है, न ही क्षणिक; यह दीर्घकालीन सामाजिक चेतना-जागरण का परिणाम है, जिसे ग्राम से महानगर तक, विद्यालयों से मीडिया तक, समाज के हर स्तर में अनुभव किया जा सकता है।लंबे समय तक जो वर्ग “तटस्थता” या “उदारवादी मुखौटे” के नाम पर भारतीय जीवन-मूल्यों के विपरीत धाराओं के साथ बैठने को प्रतिष्ठा समझता था,आज वही वर्ग स्वयं को राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की धारा में पुनःस्थापित करता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव किसी राजनीतिक निष्ठा से अधिक, सांस्कृतिक स्वाभिमान की ओर लौटने का संकेत है।

‘रंग बदलने’ का नहीं, ‘परिवेश बदलने’ का समय  :
जो लोग कहते थे कि यह वर्ग “नहीं बदलेगा”—वे भूल जाते हैं कि मनुष्य का रंग नहीं बदलता, परिवेश बदलते ही चेतना का रंग अवश्य बदल जाता है। कल तक “बेशर्म भगवा” के गीत फिल्माये और आरोपित किये जा रहे थे। आज वही भगवा राष्ट्रचेतना का प्रतीक बनकर सम्मान और स्वीकृति प्राप्त कर रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि कलाकार, लेखक, फिल्मकार किसी डर या दबाव में दिशा बदल रहे हैं— बल्कि यह कि वे उस सांस्कृतिक सत्य की ओर लौट रहे हैं जिसे लंबे समय तक विचारधारात्मक धुंध ने ढँक रखा था।

फ़िल्मकारों और कलाकारों का सांस्कृतिक पुनर्जागरण :

भारतीय सिनेमा और कला जगत लंबे समय तक एक खास वैचारिक घेरे में बँधकर रह गया था। राष्ट्र, धर्म, इतिहास, परंपरा—इन शब्दों का प्रयोग भी “असहजता” से भर देता था। लेकिन आज—
* फ़िल्मकार भारतीय पराक्रम, नायकों और सभ्यता पर केंद्रित कथाएँ लिख रहे हैं।
* कलाकार भारतीय सौंदर्यशास्त्र, परंपरा और आध्यात्मिकता को नए सिरे से अभिव्यक्त कर रहे हैं।
* बड़े प्रोडक्शन हाउस वैश्विक बाज़ार से अधिक भारतीय मानस को समझने लगे हैं।
यह बदलाव बाजार की मजबूरी नहीं—चेतना की पुकार है। देश का समाज अपने नायकों और अपनी जड़ों की कहानी स्वयं कहना चाहता है, और कलाकार उस आवेग को महसूस कर रहे हैं।

 पॉवर हाउस और इन्फ्लुएंसर्स का वैचारिक स्थानांतरण :
सोशल मीडिया के उभार ने एक नई शक्ति उत्पन्न की— जनता का सीधा संवाद तंत्र। इन्फ्लुएंसर हों या सार्वजनिक चेहरे— उनके लिए अब यह छिपाना संभव नहीं कि राष्ट्र का नवयुवक क्या चाहता है, और उसकी सांस्कृतिक अपेक्षाएँ किस ओर हैं। आज कई प्रख्यात चेहरे खुलकर— भारतीय परंपरा, आध्यात्मिकता, विरासत, राष्ट्रनिष्ठा और सामाजिक एकता की पैरवी करते दिख रहे हैं। यह “पाला बदलना” नहीं, सत्य की दिशा में झुकना है। जब राष्ट्र की चेतना जागती है, तो सबसे पहले संवेदनशील हृदय—यानी कलाकार और विचारक—उसी की ओर मुड़ते हैं।

लेखक, कवि और बौद्धिक जगत में वैचारिक उलटफेर :

लंबे समय तक साहित्य और बौद्धिक जगत के द्वार उन विचारों के लिए बंद थे, जो भारत को सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में देखते थे। लेकिन अब—
* भारतीयता,
* धर्मदर्शन,
* सभ्यता विमर्श,
* परंपरा का पुनर्पाठ,
* और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं।कवि मिथकों को पुनः पढ़ रहे हैं, लेखक इतिहास को पुनः खोज रहे हैं, और कथाकार भारतीय जीवन-मूल्यों को अपनी रचनाओं में केन्द्रीय स्थान दे रहे हैं। यह संक्रमण नहीं—पुनर्स्थापन है।

पत्रकारिता और मीडिया के स्वर में परिवर्तन
भारतीय मीडिया लंबे समय तक पश्चिमी टेम्प्लेट में फँसा रहा। राष्ट्रवादी चेतना को “कट्टरता” और “अंधराष्ट्रवाद” जैसे नाम देकर छिपाया गया। लेकिन अब—
युवा पत्रकार इतिहास और संस्कृति पर तथ्यपूर्ण सामग्री ला रहे हैं,रिपोर्टिंग में जमीनी भारत की उपस्थिति बढ़ी है, और भारत-केंद्रित दृष्टि (India-centric worldview) को स्वीकार्यता मिल रही है।
मीडिया भी समझ रहा है कि नई पीढ़ी किसी थोपे हुए एजेंडा के नहीं—अपने मूल्यों के साथ खड़ी पत्रकारिता को स्वीकार करती है।

संघ की भूमिका: सामाजिक संचेतना का दीर्घकालिक अभियान -

यह राष्ट्रीय चेतना का जागरण किसी एक घटना, एक शब्द या एक व्यक्ति का परिणाम नहीं है।यह संघ और उससे प्रेरित सामाजिक- सांस्कृतिक संगठनों के दशकों के सामाजिक समर्पण, ग्राम-कार्य, सेवा प्रकल्पों, और जन-संचार की साधना का फल है। संघ ने किसी के हाथ से “कलम” या “कैमरा” नहीं छीना— उसने समाज के हृदय में भारतीयता की लौ पुनः प्रज्वलित की। कलाकार, लेखक, फिल्मकार, पत्रकार—सब उसी प्रकाश को अब अपनी कृतियों में देख पा रहे हैं।

यह समय है सांस्कृतिक पुनर्जन्म का -  यह कहना गलत होगा कि ये लोग बदल गए— सच यह है कि देश बदला, तो उनकी दृष्टि भी स्वाभाविक रूप से बदल गई। आज भारतीय परंपरा, हिन्दुत्व से युक्त राष्ट्रीयत्व, और सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों का जो उन्मेष दिखाई देता है— वह किसी राजनीतिक विजय नहीं, सांस्कृतिक विजय है। और यही कारण है कि कलाकारों से लेकर लेखक, पत्रकार और पावर हाउस— सब एक-एक कर उसी दिशा में खड़े होते दिख रहे हैं। जहाँ भारत की चिति, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना अपनी नई उजली धारा में बह रही है।

— कैलाशचंद्र
( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।

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Web Title: Spread of national consciousness and transformation of sanskritik background by kailashchandra

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