संत रविदास का जीवन-संदेश और समरस भारत की दिशा
संत रविदास का जीवन-संदेश और समरस भारत की दिशा हरियाणा के समालखा स्थित माधव सृष्टि में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा 2026 में संत शिरोमणि संत …

संत रविदास का जीवन-संदेश और समरस भारत की दिशा

हरियाणा के समालखा स्थित माधव सृष्टि में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा 2026 में संत शिरोमणि संत रविदास के 650वें प्राकट्य वर्ष के अवसर पर व्यक्त विचार केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि भारतीय समाज के लिए एक गहरा मार्गदर्शन हैं। यह अवसर हमें उस महान संत परंपरा की स्मृति दिलाता है जिसने सदियों से भारत को आध्यात्मिक शक्ति, सामाजिक समरसता और मानवीय संवेदना का मार्ग दिखाया है।

संत रविदास का प्रेरणादायी जीवन
संत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी के समीप एक साधारण परिवार में हुआ। वे कर्म से जूते बनाने का कार्य करते थे, परंतु उनकी आत्मा भक्ति और आध्यात्मिक साधना में निमग्न रहती थी। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि श्रम कोई हीन कार्य नहीं, बल्कि ईश्वर की साधना का ही एक रूप है। इसी कारण उन्होंने समाज में श्रम की प्रतिष्ठा का संदेश दिया—एक ऐसा संदेश जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
उनकी भक्ति निर्गुण भाव की थी, जिसमें ईश्वर को निराकार, सर्वव्यापक और सबके भीतर विद्यमान माना गया। उनके पदों में बार-बार एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना मिलती है जहाँ किसी प्रकार का भेदभाव न हो। उनके प्रसिद्ध पद “बेगमपुरा शहर को नांव” में वे एक ऐसे समाज का चित्रण करते हैं जहाँ न भय है, न कर, न भेदभाव—एक ऐसा समाज जो समानता, सम्मान और न्याय पर आधारित हो। संत रविदास का जीवन करुणा, सेवा और समता का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने जन्म के आधार पर ऊँच-नीच को अस्वीकार करते हुए मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार चरित्र और आचरण को माना। उनकी वाणी में सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध स्पष्ट चेतना दिखाई देती है। यही कारण है कि उनकी वाणी को व्यापक सम्मान मिला और गुरु ग्रंथ साहिब में उनकी 41 वाणियों को स्थान प्राप्त हुआ। उनके व्यक्तित्व की महानता का प्रभाव इतना व्यापक था कि समाज के सभी वर्गों ने उन्हें स्वीकार किया। काशी के विद्वान, सामान्य जन और राजपरिवार—सभी उनके प्रति श्रद्धावनत हुए। महान भक्त मीराबाई ने उन्हें अपना गुरु माना। गुरु और शिष्य के रूप में संत रविदास और मीराबाई का संबंध भारतीय भक्ति परंपरा में सामाजिक समरसता का एक अनूठा उदाहरण है—जहाँ जाति या सामाजिक स्थिति का कोई महत्व नहीं, केवल भक्ति और आत्मीयता का संबंध है।
कठिन काल में धर्म और समाज की रक्षा
संत रविदास ऐसे समय में प्रकट हुए जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों से घिरा था। विदेशी आक्रमणों और सामाजिक विघटन के बीच उन्होंने भक्ति की निर्मल धारा को प्रवाहित किया। उन्होंने लोगों को धर्म, नैतिकता और आत्मबल के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। अनेक प्रयासों के बावजूद वे अपनी आस्था से विचलित नहीं हुए। उनकी आध्यात्मिक शक्ति इतनी प्रभावशाली थी कि उन्हें मतांतरित करने का प्रयास करने वाले लोग भी अंततः उनके अनुयायी बन गए।
वर्तमान समय में संत रविदास का संदेश
आज जब समाज को जाति, वर्ग और विभिन्न पहचान के आधार पर बाँटने के प्रयास दिखाई देते हैं, तब संत रविदास का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि समाज की शक्ति विभाजन में नहीं, बल्कि समरसता और एकात्मता में है। मनुष्य की असली पहचान उसका जन्म नहीं, बल्कि उसका आचरण और उसका मानवीय दृष्टिकोण है।

संघ का शताब्दी वर्ष और पंच परिवर्तन का अभियान
इसी सामाजिक समरसता की दिशा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में “पंच परिवर्तन” के माध्यम से व्यापक समाज-जागरण का अभियान चला रहा है। यह पाँच परिवर्तन—
1. सामाजिक समरसता,
2. परिवार प्रबोधन,
3. पर्यावरण संरक्षण,
4. स्वदेशी जीवनशैली,
5. नागरिक कर्तव्यबोध—
समाज में मानवीय विकास की नई चेतना उत्पन्न करने के प्रयास हैं।
इन अभियानों के माध्यम से संघ देशभर में समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने, पारस्परिक सम्मान बढ़ाने और सेवा-कार्य के माध्यम से संवेदना जागृत करने का प्रयास कर रहा है। सामाजिक समरसता के कार्यक्रमों, सेवा-प्रकल्पों, ग्राम-विकास कार्यों और सांस्कृतिक जागरण के माध्यम से संघ का प्रयास है कि समाज के प्रत्येक वर्ग में आत्मीयता और एकत्व का भाव मजबूत हो।
समरस समाज की दिशा में संकल्प
संत रविदास का जीवन और संदेश हमें यह सिखाता है कि समाज में परिवर्तन केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि आचरण से आता है। जब हम श्रम का सम्मान करेंगे, भेदभाव को त्यागेंगे और सेवा को जीवन का आधार बनाएँगे, तभी सच्चे अर्थों में समरस समाज का निर्माण होगा। आज संत रविदास के 650वें प्राकट्य वर्ष का अवसर हमें यही प्रेरणा देता है कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें और समाज में समता, करुणा और भाईचारे की भावना को मजबूत करें।
यदि संत रविदास की समता-दृष्टि और समाज-जागरण की चेतना को हम अपने जीवन और सामाजिक व्यवहार में स्थान दें, तो निश्चित ही एक ऐसा भारत निर्मित होगा जहाँ हर व्यक्ति सम्मान के साथ जी सके—एक ऐसा भारत जो वास्तव में समरस, संवेदनशील और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण हो।
- कैलाश चन्द्र
( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।
लेखक के बारे में
Web Title: The life-message of Saint Ravidas and the direction of a Samras bharat by kailashchandra
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