अपेक्षाओं का बोझ महसूस नहीं करता: गिल
अपेक्षाओं का बोझ महसूस नहीं करता: गिल
अहमदाबाद, 30 मई (भाषा) कप्तान के तौर पर अपने पहले इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) खिताब की दहलीज पर खड़े शुभमन गिल ने कहा कि उन्हें अपेक्षाओं का बोझ महसूस नहीं होता लेकिन उन्हें उम्मीद है कि रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (आरसीबी) के खिलाफ फाइनल में गुजरात टाइटन्स को घरेलू मैदान पर खेलने का फायदा मिलेगा।
गुजरात टाइटन्स और गत चैंपियन आरसीबी दोनों ही टीम रविवार को यहां के विशाल नरेन्द्र मोदी स्टेडियम में अपना दूसरा आईपीएल खिताब जीतने की कोशिश करेंगी।
फाइनल की पूर्व संध्या पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में गिल ने कहा, ‘‘सच कहूं तो मुझे उम्मीदों का बोझ महसूस नहीं होता। यहां खेलने के कुछ फायदे हैं, यहां का माहौल जाना-पहचाना लगता है क्योंकि हम यहां की पिच और मैदान को जानते हैं। इसलिए हमें पता है कि यहां जीतने के लिए हमें किस तरह का क्रिकेट खेलना होगा। ’’
उन्होंने आगे कहा, ‘‘इस लिहाज से मैं इसे (घरेलू मैदान पर खेलने को) एक फायदे के तौर पर देखता हूं क्योंकि यहां की पिच को हम थोड़ा बहुत जानते-पहचानते हैं। अगर आप जीतते हैं, तो यह एक शानदार सत्र होगा। अगर आप नहीं जीतते हैं तो भी यह एक अच्छा सत्र ही रहेगा, लेकिन अगर आप जीतते हैं तो यह और भी बेहतर होगा। ’’
मुल्लांपुर में शुक्रवार रात दूसरे क्वालीफायर में राजस्थान रॉयल्स को सात विकेट से हराकर गुजरात टाइटन्स फाइनल में पहुंची और इसके बाद वे अहमदाबाद के लिए रवाना हुए।
इससे पहले पहले क्वालीफायर में वे धर्मशाला में थे जहां उन्हें आरसीबी से 92 रन के बड़े अंतर से हार मिली।
तो क्या फाइनल से पहले अलग-अलग जगहों पर सफर करने की वजह से उन्हें थकान को लेकर चिंता है तो गिल ने कहा कि यह सब मानसिकता की बात है।
उन्होंने कहा, ‘‘धर्मशाला पहुंचना और वहां का सफर करना थोड़ा मुश्किल होता है। लेकिन, शारीरिक तौर पर उन्हें (आरसीबी को) शायद थोड़ा फायदा मिल सकता है। लेकिन मुझे लगता है कि फाइनल पूरी तरह से मानसिक खेल होता है। इसलिए जो टीम मानसिक तौर पर इस चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार होगी, वही टीम जीतेगी। ’’
जहां ज्यादातर टीमों ने शुरू से ही आक्रामक बल्लेबाजी का तरीका अपनाया, तो वहीं गुजरात टाइटन्स ने शुरुआत में विकेट बचाकर रखे और फिर धीरे-धीरे रन गति बढ़ाई। गिल ने अपनी टीम के खेलने के इस तरीके को सही ठहराया।
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि असली बात तो काम को पूरा करना है। मतलब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप काम कैसे करते हैं। जब तक आप काम करते रहते हैं, बस यही सबसे जरूरी बात है। ’’
भाषा नमिता मोना
मोना

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