नयी दिल्ली, 22 जनवरी (भाषा) भारत और ईस्ट बंगाल के पूर्व डिफेंडर इलियास पाशा का बृहस्पतिवार को यहां लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।
उनके परिवार में पत्नी, दो बेटियां और दो बेटे हैं।
अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) ने पाशा के निधन पर शोक व्यक्त किया है। पाशा का नाम कर्नाटक के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खिलाड़ियों में शुमार है।
समर्पित और मृदुभाषी खिलाड़ी पाशा ने डिफेंस में अपना दबदबा कायम किया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाशा ने 27 जनवरी 1987 को कोझिकोड में नेहरू कप के दौरान बुल्गारिया के खिलाफ भारत के लिए पदार्पण किया।
उन्होंने कुल आठ अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले और 1987 तथा 1991 के नेहरू कप, 1991 सैफ खेलों और 1992 एशियाई कप क्वालीफायर्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
पाशा ने अपने फुटबॉल करियर की शुरुआत उत्तर बेंगलुरु के वायलिकावल स्थित विनायका फुटबॉल क्लब से की।
उन्हें लगातार अच्छे प्रदर्शन के चलते 1980 के दशक के मध्य में इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज (आईटीआई) का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। उन्होंने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा और फिर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम की।
वह मुश्किल परिस्थितियों में भी दबाव में नहीं आते थे। उनके अनुशासित खेल और गेंद पर शानदार नियंत्रण के कारण प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ियों को ज्यादा सफलता नहीं मिलती थी। इससे गोलकीपर का भी आत्मविश्वास बढ़ता था।
वह 1987 से संतोष ट्रॉफी में कर्नाटक टीम के नियमित खिलाड़ी बन गए। उन्होंने 1987 में कोलकाता, 1988 में क्विलोन (अब कोल्लम) और 1989 में गुवाहाटी में आयोजित टूर्नामेंटों में राज्य का प्रतिनिधित्व किया।
गुवाहाटी में उनका प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, जहां कर्नाटक बेहद कम अंतर से फाइनल में पहुंचने से चूक गया।
उन्होंने इसके अलावा 1993 और 1995 में बंगाल की ओर से खेलते हुए दो संतोष ट्रॉफी खिताब भी जीते।
घरेलू फुटबॉल में शानदार प्रदर्शन के बाद पाशा के साथ मोहम्मडन स्पोर्टिंग ने करार किया। इस क्लब के साथ उन्होंने 1989 में सैत नागजी ट्रॉफी और निजाम गोल्ड कप जीतकर अपनी प्रतिष्ठा और मजबूत की।
वह इसके बाद ईस्ट बंगाल से जुड़े, जो उनके क्लब करियर का सबसे सुनहरा दौर साबित हुआ। 1990 के दशक की शुरुआत से लेकर दशक के अंत तक पाशा क्लब के सबसे सफल दौर का अहम हिस्सा बने।
उन्होंने 1993-94 सत्र में ईस्ट बंगाल की कप्तानी की और दिवंगत कोच सुभाष भौमिक के भरोसेमंद खिलाड़ी रहे। ईस्ट बंगाल के साथ उन्होंने कलकत्ता फुटबॉल लीग पांच बार (1991, 1993, 1995, 1996 और 1998), आईएफए शील्ड पांच बार (1990, 1991, 1994, 1995 और 1997) और डूरंड कप चार बार (1990, 1991, 1993 और 1995) जीता।
उनके खिताबों में दो रोवर्स कप (1990, 1994), फेडरेशन कप (1996), काठमांडू में आयोजित ऐतिहासिक वाई वाई कप (1993), एयरलाइंस ट्रॉफी (1990, 1992, 1995, 1997), बोरदोलोई ट्रॉफी (1992), एटीपीए शील्ड (1992), कलिंग कप (1993), मैकडॉवेल ट्रॉफी (1995, 1997) और 1996-97 सत्र का सुपर कप भी शामिल है।
वह 1990 में ईस्ट बंगाल की तीन ऐतिहासिक खिताब जीतने वाली टीम का भी हिस्सा थे और 1993 में वाई वाई कप में क्लब ने उनकी कप्तानी में अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय ट्रॉफी जीती।
उनकी कप्तानी में टीम ने 1993-94 एशियाई विनर्स कप में इराक के अल जवरा एससी के खिलाफ 6-2 की ऐतिहासिक जीत हासिल की थी।
उन्हें 2012 में ईस्ट बंगाल ने विशेष ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ से सम्मानित किया।
एआईएफएफ ने कहा कि भारतीय फुटबॉल जगत पाशा जैसे संयमित और निरंतर प्रदर्शन करने वाले डिफेंडर के निधन पर शोक व्यक्त करता है और खेल के प्रति उनके अमूल्य योगदान को सम्मान पूर्वक याद करता है।
भाषा आनन्द पंत
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