बदनाम स्कूली बच्चे से भारत के गौरव तक: पटाखे वाली शरारत के बाद जय मीणा ने रचा इतिहास
बदनाम स्कूली बच्चे से भारत के गौरव तक: पटाखे वाली शरारत के बाद जय मीणा ने रचा इतिहास
कोलकाता, 23 सितंबर (भाषा) स्कूल के दिनों में प्रधानाचार्य की मेज के नीचे पटाखा जलाने वाले शरारती बच्चे से लेकर एशियाई खेलों में सॉफ्ट टेनिस का पदक जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी बनने तक जय मीणा का सफर किसी रोमांचक कहानी से कम नहीं है।
छब्बीस वर्षीय जय को महज 10 साल की उम्र में देवास के एबेनेजर हायर सेकेंडरी स्कूल से उनकी बचपन की शरारतों के कारण निकाल दिया गया था।
बुधवार को उन्होंने आइची-नागोया एशियाई खेलों में ऐतिहासिक कांस्य पदक अपने नाम किया। सेमीफाइनल में उन्हें जापान के स्थानीय दावेदार और बाद में चैंपियन बने ताकुया कुरोसाका से 2-4 से हार का सामना करना पड़ा।
सॉफ्ट टेनिस में दोनों सेमीफाइनल हारने वाले खिलाड़ियों को कांस्य पदक दिया जाता है। जापान से शुरू हुआ यह रैकेट खेल पारंपरिक टेनिस जैसे कोर्ट पर खेला जाता है लेकिन इसमें करीब 31 ग्राम की काफी हल्की रबर गेंद और हल्के रैकेट इस्तेमाल होते हैं।
नागोया से पीटीआई से बातचीत में जय ने कहा, ‘‘पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि सब कुछ मेरी किस्मत में लिखा था… अगर मुझे उस स्कूल से नहीं निकाला गया होता तो मैं पायनियर पब्लिक स्कूल में नहीं आ पाता, भारत के लिए नहीं खेल पाता और भारत के लिए पदक नहीं जीत पाता। शायद सब कुछ तय था।’’
जय के माता-पिता वकील रमेश्वर मीणा और संजना बचपन में उनकी शरारतों को लेकर लगातार चिंतित रहते थे। लेकिन मामला तब गंभीर हो गया जब स्कूल से उनके माता-पिता को फोन आया कि जय ने प्रधानाचार्य की मेज के नीचे पटाखा जला दिया है।
जय ने याद करते हुए कहा, ‘‘मेरा परिवार बहुत नाराज था और उसके बाद कोई भी स्कूल मुझे दाखिला देने के लिए तैयार नहीं था।’’
ऐसे समय में पायनियर पब्लिक स्कूल और उसके खेल प्रशिक्षक सुदेश सांगते ने उनकी मदद की। सांगते अब राष्ट्रीय सॉफ्ट टेनिस कोच हैं।
जय ने कहा, ‘‘उन्होंने मेरे पिता से कहा, ‘अगर आप बच्चे को घर पर नहीं रखना चाहते तो उसे यहां खेलने के लिए भेज दीजिए।’ बस शर्त यह थी कि मुझे खेल अकादमी में दाखिला लेना होगा। वहीं से मेरी यात्रा शुरू हुई।’’
जय भारतीय भाला फेंक स्टार नीरज चोपड़ा के बड़े प्रशंसक हैं।
पूर्व राष्ट्रीय स्तर के खो-खो खिलाड़ी सांगते ने स्कूल में सॉफ्ट टेनिस की शुरुआत की थी। उन्होंने इस बेचैन बच्चे में वह प्रतिभा देखी जिसे शायद उसके शिक्षक भी नहीं पहचान पाए थे।
सांगते ने कहा, ‘‘वह बहुत शरारती था, हमेशा बेचैन रहता था और लगभग हर खेल में अच्छा था। इससे उसे फायदा हुआ क्योंकि सॉफ्ट टेनिस में काफी मूवमेंट और दौड़ की जरूरत होती है। इस खेल में ताकत, गति और काफी कौशल चाहिए। आपको पूरे कोर्ट को कवर करना होता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उसमें एथलेटिक क्षमता, ऊर्जा और सीखने की इच्छा थी। हम करीब 10 साल से कड़ी मेहनत कर रहे हैं और आज उसने हमें वह नतीजा दिया जिसका हम इंतजार कर रहे थे।’’
जय ने कहा कि उनके लिए यह पदक ओलंपिक जैसा है।
उन्होंने कहा, ‘‘मेरे लिए यह ओलंपिक पदक जैसा है क्योंकि सॉफ्ट टेनिस ओलंपिक का हिस्सा नहीं है। एशियाई खेल एशिया के ओलंपिक जैसे हैं और हमारे खेल के सभी बड़े देश यहां मौजूद थे। उनके बीच पदक जीतना बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसलिए मेरे और मेरे देश के लिए यह ओलंपिक पदक जैसा है।’’
जय को उम्मीद है कि कांस्य पदक इस खेल के लिए बड़ा रास्ता खोल सकता है और इसे अहमदाबाद में होने वाले 2030 राष्ट्रमंडल खेलों में शामिल किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत में 2030 में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों को देखते हुए मुझे उम्मीद है कि सॉफ्ट टेनिस को इसमें शामिल किया जाएगा। अगर सॉफ्ट टेनिस 2030 राष्ट्रमंडल खेलों में शामिल होता है तो मेरा मानना है कि भारत सभी पांच स्वर्ण पदक जीत सकता है। राष्ट्रमंडल देशों में भारत नंबर एक है।’’
भाषा सुधीर नमिता
नमिता

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