(तस्वीरों के साथ) … अजय मसंद …
नागोया, 21 सितंबर (भाषा) हिमांशु ढिल्लों को कुश्ती के अखाड़े में अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन वहां से कभी हार न मानने के जज्बे और जुझारूपन ने एशियाई खेलों में रजत पदक के साथ उनके निशानेबाजी करियर को यादगार बना दिया। अपने 21वें जन्मदिन पर ढिल्लों ने हमवतन पूर्व विश्व चैंपियन रुद्रांक्ष पाटिल को पीछे छोड़ते हुए सोमवार को यहां एशियाई खेलों की पुरुष 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में रजत पदक अपने नाम किया। यह सीनियर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ढिल्लों का पहला पदक है और खास बात यह है कि कुश्ती के साथ उनके छोटे से जुड़ाव से मिले सबक ने उनकी निशानेबाजी की तकनीक में अहम भूमिका निभाई। पिछले साल नई दिल्ली में जूनियर विश्व कप चैंपियन बने ढिल्लों ने अपने करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि के बाद कहा, “जब मैंने निशानेबाजी शुरू की थी तो मन में आता था ‘मैंने कहां पंगा ले लिया।’ जब मैं कुश्ती के मैट पर लेटता था, तब भी सोचता था कि क्या मैंने सही फैसला किया है।’’ उन्होंने कहा, “आज रजत पदक जीतने के बाद मुझे एहसास हो रहा है कि मैंने जो फैसला लिया था, वह सही था। वह गलत फैसला नहीं था।” ढिल्लों के लिए निशानेबाजी उनके मूल लक्ष्य का हिस्सा कभी नहीं थी। उनके पिता ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कैथल के गुरुकुल पुंडरी भेजा था। बचपन में हिमांशु का वजन भी कुछ ज्यादा था। ऐसे में उनके चाचा हरदीप सिंह ढिल्लों (2016 रियो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके) ने उन्हें कुश्ती अपनाने की सलाह दी। इस युवा खिलाड़ी को हालांकि जल्द ही एहसास हो गया कि उनके लिए कुश्ती एक अलग ही तरह की चुनौती है। उन्होंने कहा, ‘‘कुश्ती कठिन और मुश्किल खेल है। मैं उसकी कड़ी मेहनत और चुनौतियों के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहा था।’’ गुरुकुल में एक निशानेबाजी परिसर भी थी। हिमांशु वहां समय बिताने लगे और धीरे-धीरे उनका रुझान उस खेल की ओर बढ़ता गया, जिसने आगे चलकर उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। इस सफर में उनके माता-पिता ने भी कई त्याग किए। वे अपना गांव छोड़कर बेटे का साथ देने कैथल आ गए। ऐसे में सोमवार को मिला पदक हिमांशु के लिए और भी खास बन गया। उन्होंने कहा, “मेरे माता-पिता ने भी त्याग किया। वे अपना गांव छोड़कर कैथल आए। इसलिए मैं बहुत खुश हूं कि उनके त्याग का फल मिला।” ढिल्लों ने कहा, “मेरे कोच ने मुझसे प्रक्रिया पर ध्यान देने और मुकाबले, फाइनल या पदक के बारे में ज्यादा सोचने से बचने को कहा। उन्होंने मुझे वर्तमान क्षण में रहने की सलाह दी।” यह सलाह और कुश्ती के मैट से हासिल किया हुआ संघर्ष करने का जज्बा फाइनल के तनावपूर्ण आखिरी दौर में निर्णायक साबित हुआ। उन्होंने कहा, “जब कांस्य पदक पक्का हो गया था, तब शायद मैं उम्मीद छोड़ सकता था। लेकिन मेरा रवैया हार मानने का नहीं था। मुझे अब भी लग रहा था कि पदक का रंग बदल सकता है। शायद रुद्रांक्ष (पाटिल) से गलती हो जाए या मैं अच्छा स्कोर कर दूं।” रुद्रांक्ष से चूक हुई और ढिल्लों ने मुकाबला जारी रखते हुए मिले मौके को भुना लिया। उन्होंने अपने अधिक अनुभवी साथी को पीछे छोड़कर रजत पदक हासिल कर लिया। ढिल्लों ने कहा, “मैं हरियाणा से हूं और मेरे पिता हमेशा कहते हैं कि सिर्फ सोना लाओ, कोई और पदक नहीं। जो स्वर्ण जीतता है वही विजेता है, बाकी सभी हारने वाले हैं।’’ इसलिए 21वें जन्मदिन पर अपना पहला सीनियर अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने और भारत के एशियाई खेलों के पदक अभियान में योगदान देने के बावजूद ढिल्लों की नजर अब रजत से आगे है। उन्होंने कहा, ‘‘आज फाइनल में भी मेरा लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका। लेकिन मैं जल्द ही किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण जीतने की कोशिश करता रहूंगा।’’ भाषा आनन्द पंतपंत