यह कांस्य पदक मेरे जीवन से बढकर है : एमएमए फाइटर सुचिका

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यह कांस्य पदक मेरे जीवन से बढकर है : एमएमए फाइटर सुचिका

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  • Publish Date - September 21, 2026 / 04:06 PM IST,
    Updated On - September 21, 2026 / 04:06 PM IST

(फिलेम दीपक सिंह)

नागोया, 21 सितंबर (भाषा ) एशियाई खेलों की मिश्रित मार्शल आर्ट स्पर्धा में भारत को पहला पदक दिलाने वाली सुचिका तरियाल ने कांस्य पदक जीतने के बाद कहा ,‘‘ अब कोई मलाल नहीं है , चैन से मर सकती हूं ।’’

36 वर्ष की सुचिका को सोमवार को यहां महिला पारंपरिक 60 किग्रा मिश्रित मार्शल आर्ट (एमएमए) स्पर्धा के सेमीफाइनल में सिंगापुर की हुई हून टियो के खिलाफ विवादास्पद तरीके से हार का सामना करना पड़ा जब दोनों खिलाड़ियों के बीच मुकाबला ड्रॉ रहने के बाद कम वजन के आधार पर टियो को विजेता घोषित किया गया और भारतीय खिलाड़ी को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा।

हरियाणा के रोहतक जिले के किलोइ गांव की सुचिका ने पीटीआई से कहा ,‘‘ यह मेरे जीवन से बढकर है । मैं कभी नहीं भुलूंगी कि जापान आकर देश के लिये पदक जीता था । अब मैं चैन से मर सकती हूं ।’’

उन्होंने कहा ,‘‘ मैने 2022 राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो में हिस्सा लिया था लेकिन कांस्य से चूक गई थी । मैं देश के लिये पदक जीतना चाहती थी ताकि लोग मुझे जाने । मैं जियु जित्सु में भी विश्व चैम्पियन हूं । एशियाई खेलों में कुराश में भी भाग लिया लेकिन वहां पदक नहीं जीत सकी । मुझे फिर से मौका मिला और इसके लिये मैने बहुत मेहनत की थी ।’’

उनकी प्रेरणा ओलंपिक कांस्य पदक विजेता और छह बार की विश्व चैम्पियन मैरी कॉम हैं ।

उन्होने कहा ,‘‘ मैं बचपन से मैरी दीदी की प्रशंसक हूं । मैं भी 2009 . 10 में भोपाल में जूडो के राष्ट्रीय शिविर में थी और उनकी शख्सियत की कायल हो गई । वह मेरी आदर्श हैं ।’’

अपने कैरियर की शुरूआत में कई वित्तीय दिक्कतों का सामना करने वाली सुचिका ने कहा ,‘‘ मैने अभ्यास के लिये अपने विभाग से अवैतनिक अवकाश लिया । आर्थिक अडचनों का काफी सामना करना पड़ा । मेरे पति ने मेरी मदद की जिसकी वजह से यहां तक पहुंच सकी हूं । में अपने माता पिता और पति को यह पदक समर्पित करती हूं ।’’

दो एमएमए फाइटर्स के लिये कोच नहीं होने पर निराशा जताते हुए उन्होंने कहा ,‘‘ हमारे कोचों ने खुद खर्च करके हमारी मदद की । उन्हें सरकार से कोई सहायता नहीं मिली । हमारे साथ कोई कोच होता तो मैं अपना वजन कम कर सकती थी और जीत सकती थी ।’’

भाषा

मोना पंत

पंत