… एमआरएम मिश्रा …
नयी दिल्ली, 29 मई (भाषा) फ्लडलाइट्स बुझ जाने और दर्शकों का शोर रात में विलीन हो जाने के काफी देर बाद भी आधुनिक क्रिकेटर के सामने सबसे कठिन संघर्ष अक्सर शुरू ही होता है जो है नींद पूरी कर पाने का संघर्ष। देर रात तक खत्म होने वाला टी20 मुकाबला और अगले ही दिन सुबह किसी दूसरे शहर की उड़ान, 12 घंटे से भी कम समय में अभ्यास सत्र और फिर एक और बड़े दबाव वाला मैच, आज के दौर में शीर्ष स्तर के क्रिकेट के अति-व्यस्त कार्यक्रम में खिलाड़ियों के लिए ‘रिकवरी’ (चोट और थकान से उबरना) का समय लगातार सिकुड़ता जा रहा है। ऐसे में टीम प्रबंधन और खेल वैज्ञानिक अब नींद को केवल आराम की प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले एक अत्यंत नियंत्रित और मापनीय उपकरण के रूप में देखने लगे हैं। जो चीज पहले तक केवल जीवनशैली से जुड़ा विषय मानी जाती थी, वही अब आधुनिक एथलीट प्रबंधन का सबसे अहम हिस्सा बन चुकी है। वर्तमान में शीर्ष स्तर के क्रिकेट में ‘स्लीप ट्रैकर’ पहनना, ‘रिकवरी स्कोर’, ‘सर्कैडियन रिद्म’ (जैविक घड़ी) की योजना और ‘जेट लैग’ (विमान यात्रा की थकान) से निपटने के प्रोटोकॉल जैसे वैज्ञानिक उपाय तेजी से अपनाए जा रहे हैं। इसका लक्ष्य शीर्ष स्तर के प्रदर्शन को बनाए रखने के साथ-साथ चोटों की संभावना को कम करना है। भारतीय दल के साथ पेरिस ओलंपिक के दौरान ‘स्लीप एडवाइजर’ के रूप में यात्रा कर चुकीं नींद विशेषज्ञ डॉ मोनिका शर्मा के अनुसार, भारतीय खेल जगत में यह एक अपेक्षाकृत नया लेकिन बेहद महत्वपूर्ण आयाम है। उन्होंने ‘पीटीआई’ से कहा, “जब हम एलीट खेल की बात करते हैं, तो प्रशिक्षण की गुणवत्ता अब अकेला निर्णायक कारक नहीं रह गई है।” उन्होंने कहा, “दो खिलाड़ी समान कार्यक्रम का पालन कर सकते हैं, समान आहार ले सकते हैं और उनकी प्रतिभा भी लगभग बराबर हो सकती है, लेकिन अंततः वही खिलाड़ी लंबी अवधि तक बेहतर प्रदर्शन करता है, जो बेहतर नींद और बेहतर रिकवरी सुनिश्चित करता है। ऐसा खिलाड़ी तेजी से परिस्थितियों के अनुसार ढलता है, पूरे सत्र में अधिक स्वस्थ रहता है और सबसे महत्वपूर्ण बात, चोटों से दूर रहता है।” फ्रेंचाइजी लीग के बढ़ते प्रभाव, क्रिकेट के कई प्रारूपों और साल भर चलने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं ने क्रिकेटरों की ‘रिकवरी’ की पूरी गतिशीलता को मूल रूप से बदल दिया है। देर रात तक चलने वाले मुकाबले, लगातार यात्रा, समय क्षेत्रों में बदलाव और अस्थिर मैच कार्यक्रम ने अच्छी नींद हासिल करना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन बना दिया है। डॉ शर्मा के अनुसार, “टी-20 क्रिकेट में मैच अक्सर देर रात खत्म होते हैं। खिलाड़ी रात 11 बजे तक मुकाबला समाप्त कर लेते हैं, लेकिन शारीरिक स्तर पर कई प्रक्रियाओं को शांत होने में समय लगता है, इससे पहले कि मस्तिष्क वास्तव में नींद और रिकवरी की तैयारी शुरू कर सके।” उन्होंने कहा, “जिन क्रिकेटरों से मैं बात करती हूं, उनमें हम अक्सर देखते हैं कि अत्यधिक थकान के बावजूद वे रात दो या तीन बजे से पहले सो नहीं पाते। लगातार मैच, सुबह जल्दी उड़ानें और अगले दिन का अभ्यास सत्र—इन सब चीजों ने रिकवरी के लिए उपलब्ध समय को बेहद सीमित कर दिया है।” खेल विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार, अगर पर्याप्त नींद नहीं मिले तो यह केवल थकान का कारण नहीं बनती, बल्कि कई अन्य समस्याओं को भी जन्म देती है। यह प्रतिक्रिया-समय, एकाग्रता, मानसिक स्थिरता, प्रतिरक्षा प्रणाली, हार्मोनल संतुलन और यहां तक कि तकनीकी निष्पादन को भी प्रभावित करती है। डॉ शर्मा ने कहा, “जब रिकवरी पर्याप्त नहीं होती, तो शरीर की जैविक घड़ी (सर्कैडियन रिद्म) असंतुलित हो जाती है। यह असंतुलन निर्णय लेने में छोटी लेकिन महत्वपूर्ण गलतियों, बल्लेबाजी के समय-निर्धारण, गेंदबाजी की सटीकता और भावनात्मक नियंत्रण को प्रभावित करता है।” उन्होंने कहा, “कमजोर ‘रिकवरी’ चोट, बीमारी और प्रदर्शन में अस्थिरता का कारण बनती है। हम यह भी देखते हैं कि जब खिलाड़ी लगातार नींद की कमी से जूझते हैं, तो उनमें आक्रामकता के अचानक बढ़ते दौर और भावनात्मक अस्थिरता भी दिखाई देने लगती है।” वर्षों तक स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग (ताकत एवं अनुकूलन) कोच मुख्य रूप से शारीरिक फिटनेस, जिम वर्क और कार्यभार प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करते रहे। लेकिन आज के समय में रिकवरी की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच रामजी श्रीनिवासन कहते हैं, “रिकवरी किसी भी खेल में उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी ट्रेनिंग, खासकर उन खिलाड़ियों के लिए जो लगातार यात्रा करते रहते हैं।” उन्होंने कहा, “आईपीएल जैसे टूर्नामेंटों में थकान केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि मानसिक स्तर पर भी काफी असर डालती है क्योंकि खिलाड़ियों को लगातार एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता है और अलग-अलग समय, मौसम और पिच की परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना होता है।” रामजी के अनुसार, आधुनिक रिकवरी प्रणालियां अब दो भागों में बांटी जाती हैं। इनमें सक्रिय (एक्टिव) और निष्क्रिय (पैसिव) रिकवरी शामिल हैं। उन्होंने कहा, “सक्रिय रिकवरी में हल्की जॉगिंग, तैराकी सत्र, मसाज थेरेपी, योग और रिकवरी फूड्स (ऊर्जा, मांसपेशियों की मरम्मत और पोषक तत्वों की भरपाई करने वाले खाद्य पदार्थ) शामिल होते हैं। वहीं, निष्क्रिय रिकवरी में नींद लेना, संगीत सुनना, किताब पढ़ना, स्टीम और सॉना जैसे उपाय शामिल हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा, “नींद ट्रेनिंग के हर अन्य पहलू जितनी ही महत्वपूर्ण है। आप जितना बेहतर रिकवर करेंगे, आपका प्रदर्शन उतना ही बेहतर होगा।” मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र जाखड़ और सफदरजंग अस्पताल (वीएमएमसी) के प्रोफेसर डॉ. स्कंद सिन्हा मानते हैं कि आधुनिक खेलों में नींद रिकवरी के लिए सबसे जरूरी चीजों में से एक है। डॉ. जाखड़ के अनुसार, “नींद के दौरान शरीर मांसपेशियों की मरम्मत करता है, ऊर्जा को पुनःस्थापित करता है, हार्मोन का संतुलन बनाए रखता है और मानसिक सतर्कता को बेहतर बनाता है। पर्याप्त नींद नहीं मिलने पर एकाग्रता, प्रतिक्रिया-समय और भावनात्मक नियंत्रण प्रभावित होता है, साथ ही चोट लगने का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए सही ‘स्लीप हाइजीन’ बनाए रखना बेहद जरूरी है।” डॉ स्कंद सिन्हा बताते हैं कि गहरी नींद के दौरान ‘ग्रोथ हार्मोन’ का स्राव बढ़ जाता है, जिससे मांसपेशियों की मरम्मत और उनका विकास तेजी से होता है। इसी चरण में शरीर का ‘ग्लाइकोजन’ भी पुनः भरता है। अच्छी गुणवत्ता वाली नींद से सूजन और मांसपेशियों का दर्द भी कम होता है। आज के समय में पेशेवर टीमें प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए ‘स्लीप ट्रैकर’ और उन्नत ‘रिकवरी मॉनिटरिंग सिस्टम’ का लगातार उपयोग कर रही हैं। इस पूरे क्षेत्र में नींद प्रबंधन का विज्ञान भी हाल के वर्षों में तेजी से विकसित हुआ है और अब इसे खिलाड़ियों के प्रदर्शन का एक निर्णायक हिस्सा माना जाने लगा है। बेंगलुरु स्थित बीसीसीआई के ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ में आयु-समूह शिविरों में काम कर चुके स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच संजीब दास ने कहा कि नींद अब एक मापनीय प्रदर्शन मानक के तौर पर देखी जाने लगी है। भारतीय तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी और आकाश दीप के साथ काम कर चुके दास ने कहा, “आधुनिक क्रिकेट में नींद का प्रबंधन प्रदर्शन और रिकवरी के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक बन गया है।” खेल वैज्ञानिक अब खिलाड़ियों की नींद का विश्लेषण केवल उसकी अवधि तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसकी गुणवत्ता, आराम की अवस्था में हृदय गति और ‘हार्ट रेट वेरिएबिलिटी’ (एचआरवी) जैसे संकेतकों को भी गहराई से परखते हैं। इन सभी आंकड़ों को क्रिकेट के कार्यभार और थकान के संकेतकों के साथ जोड़कर समग्र मूल्यांकन किया जाता है। दास के अनुसार, “यह प्रक्रिया खेल वैज्ञानिकों और स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोचों को यह समझने में मदद करती है कि लगातार यात्रा, बढ़ता कार्यभार और अनियमित मैच समय खिलाड़ियों की रिकवरी की स्थिति को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं।” शोध अध्ययनों ने यह भी स्थापित किया है कि लंबे समय तक बनी रहने वाली नींद की कमी चोट लगने के जोखिम को बढ़ाती है, मांसपेशियों की रिकवरी को धीमा करती है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करती है। दुनिया भर में अब फॉर्मूला वन, एनबीए, ओलंपिक कार्यक्रमों, फुटबॉल क्लबों और पेशेवर साइकिलिंग जैसी शीर्ष स्तर की स्पर्धाओं में नियमित रूप से नींद विशेषज्ञों और थकान-प्रबंधन विशेषज्ञों की सेवाएं ली जा रही हैं। भारतीय खेल जगत में भी अब इस अवधारणा को तेजी से अपनाया जाने लगा है। पेरिस ओलंपिक के दौरान भारतीय दल में डॉ. शर्मा की भागीदारी इस बात का संकेत है कि नींद को अब एक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में देखा जाने लगा है। डॉ. शर्मा ने कहा, “एथलीट की रिकवरी में सबसे बड़ी गलतियों में से एक यह है कि नींद को एक निश्चित और सभी के लिए समान संख्या के रूप में देखा जाता है। आठ घंटे की नींद की सिफारिश वास्तव में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए दिया गया एक सामान्य दिशानिर्देश है। शीर्ष स्तर के खेल में इसके लिए कोई अनिवार्य या सख्त नियम नहीं है।” एलीट खेलों में थकान के खिलाफ लगातार चल रही इस कठिन प्रतिस्पर्धा में अब अच्छी नींद लेने की क्षमता भी उतनी ही अहम मानी जाने लगी है, जितनी बल्लेबाजी, गेंदबाजी या क्षेत्ररक्षण की क्षमता। (इस रिपोर्ट में खेल डेस्क से पूनम मेहरा, कुशान सरकार और जी उन्नीकृष्णन तथा स्वास्थ्य संवाददाता पायल बनर्जी ने योगदान दिया।) भाषा आनन्द नमितानमिता