बीमार पिता के संदेश पर अमल करके कैसे ‘फाइटर’ बने सारांश जैन

बीमार पिता के संदेश पर अमल करके कैसे ‘फाइटर’ बने सारांश जैन

बीमार पिता के संदेश पर अमल करके कैसे ‘फाइटर’ बने सारांश जैन
Modified Date: July 28, 2026 / 01:04 pm IST
Published Date: July 28, 2026 1:04 pm IST

(कुशान सरकार)

नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) बात 2014 की है जब 21 वर्षीय सारांश जैन इंदौर के एक क्लब की टीम के साथ ऑस्ट्रेलिया का दौरा कर रहे थे और सीमित ओवरों की क्रिकेट में अपना सपना साकार करने की कोशिश में लगे थे।

उस समय वह जब भी फोन करके अपने पिता सुबोध जैन के बारे में पूछते तो उनकी मां या बड़ा भाई बताते कि वह अभी व्यस्त हैं। उनके पिता उनके पहले और एकमात्र कोच भी थे।

जब सारांश वापस घर लौटे तो सच्चाई ने उन्हें बुरी तरह झकझोर दिया। उनके पिता को मुंह का कैंसर हो गया था।

सारांश के पिता 61 वर्षीय सुबोध ने कहा, ‘‘सर्जरी के बाद मेरा मुंह बुरी तरह सूज गया था और मैं बोल नहीं पा रहा था। जैसे ही सारांश ने मुझे देखा, वह फूट-फूट कर रोने लगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने कलम उठाई और कागज के एक टुकड़े पर लिखा, ‘बेटा, तू जितना अच्छा करेगा, मैं उतनी जल्दी ठीक हो जाऊंगा।’’

सारांश को मंगलवार को जब 33 वर्ष की उम्र में पहली बार भारतीय टेस्ट टीम में शामिल किया गया तो उनका और उनके परिवार का सपना साकार हो गया। इससे उनके पिता की लिखी बात भी सच साबित हो गई।

यह मंगलवार का दिन था और हर मंगलवार की तरह तब सारांश हनुमान मंदिर में प्रार्थना कर रहे थे जब चयनकर्ताओं ने टीम की घोषणा की।

सुबोध ने कहा, ‘‘वह मंदिर के अंदर था और पहले फोन नहीं उठा पाया। वह जब बाहर आया तब उसे अपने चयन के बारे में पता चला।’’

उन्होंने कहा, ‘‘‘मैं बेहद खुश हूं। मैंने मध्य प्रदेश के लिए रणजी ट्रॉफी खेली, लेकिन कई अन्य खिलाड़ियों की तरह मैं भी अपना सपना पूरा नहीं कर सका। आज मेरे बेटे ने इसे पूरा कर दिया है।’’

मध्य प्रदेश के पूर्व ऑफ-स्पिनर सुबोध ने स्वीकार किया कि उन्हें अपने करियर में आगे नहीं बढ़ पाने का अब भी अफसोस है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब मैं खेला करता था तब उत्तर प्रदेश के गोपाल शर्मा मध्य क्षेत्र के प्रमुख ऑफ स्पिनर थे। उन्हें प्राथमिकता दी जाती थी और वह भारत के लिए टेस्ट मैच भी खेले।’’

सुबोध ने ऑफ स्पिन कि यह कला अपने बेटे सारांश को सिखाई, जो अब उनके सपने को साकार करेगा।

उन्होंने कहा, ‘‘अब वह रविचंद्रन अश्विन के वीडियो देखता है और सीखता रहता है, लेकिन जब उसने शुरुआत की थी तब मैं उसका आदर्श था। मैंने अपने बेटे सहित रणजी ट्रॉफी में खेलने वाले कई खिलाड़ियों को कोचिंग दी है।’’

इस पूर्व ऑफ स्पिनर ने नौ रणजी ट्रॉफी मैचों में 23 विकेट लिए थे। उन्होंने कहा कि उन्हें शुरू से ही पता था कि उनका बेटा दूसरों से अलग है।

सुबोध ने कहा, ‘‘मुझे इसका अहसास तब हुआ जब वह अंडर-12 क्रिकेट खेल रहा था। सारांश और रजत पाटीदार 11 साल की उम्र से साथ खेलते आ रहे हैं। उसे खेलते हुए देखने वाले लोगों ने मुझे बताया कि उसमें कुछ खास बात है। बेशक मैं उसका कोच हूं, लेकिन मैं उसका पिता भी हूं।’’

सारांश के लिए यह सफर हालांकि आसान नहीं रहा। उन्होंने तमिलनाडु के खिलाफ रणजी ट्रॉफी में अपने पदार्पण मैच में पांच विकेट लिए, लेकिन जल्द ही उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया।

सुबोध ने कहा, ‘‘चंद्रकांत पंडित (मध्य प्रदेश के पूर्व कोच) ने उसमें कुछ खास देखा। प्रतिभा की पहचान करने में पंडित का कोई सानी नहीं था।’’

सारांश ने मध्य प्रदेश की रणजी ट्रॉफी में जीत में बल्ले और गेंद दोनों से अहम भूमिका निभाई। उन्होंने दलीप ट्रॉफी के दो मैचों में 16 विकेट लिए और ईरानी कप में भी अच्छा प्रदर्शन किया।

सुबोध की अपने बेटे के लिए एक ही सलाह है, ‘‘बेटा अगर मौका मिले तो बिंदास खेलना। किसी तरह का दबाव मत लेना।’’

भाषा

पंत मोना

मोना


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