‘करो या मरो’ की स्थिति थी: साक्षी ने राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों का टिकट हासिल करने के बाद कहा

‘करो या मरो’ की स्थिति थी: साक्षी ने राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों का टिकट हासिल करने के बाद कहा

‘करो या मरो’ की स्थिति थी: साक्षी ने राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों का टिकट हासिल करने के बाद कहा
Modified Date: May 15, 2026 / 08:04 pm IST
Published Date: May 15, 2026 8:04 pm IST

… अपराजिता उपाध्याय …

पटियाला, 15 मई (भाषा) साक्षी चौधरी पटियाला में चयन ट्रायल्स के तीन दिनों तक उस मुक्केबाज की तरह रिंग में उतरीं, जिनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा था। ‘भिवानी बॉक्सिंग क्लब’ की 25 वर्षीय इस मुक्केबाज ने असफलताओं, निराशा और आत्म-संदेह के बोझ के साथ राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों के चयन ट्रायल्स में कदम रखा था लेकिन शानदार प्रदर्शन के दम पर 51 किग्रा वर्ग में दोनों बड़े बहु-खेल आयोजनों के लिए अपना पहला टिकट हासिल कर लिया। साक्षी ने लगातार दो मुकाबलों में विश्व चैंपियनों को हराकर यह उपलब्धि हासिल की। उन्होंने कहा, “मेरी सोच स्पष्ट थी कि मुझे किसी भी तरह कोटा हासिल करना था। यह मेरे लिए करो या मरो जैसा था।” हाल ही तक उनका करियर संघर्षों से भरा रहा था। पिछले साल विश्व चैंपियनशिप में वह पेरिस ओलंपिक रजत पदक विजेता हतिसे अकबास से अंतिम 16 मैच में में हार गई थीं। इसके बाद राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी उनका प्रदर्शन निराशाजनक रहा और वे पदक दौर तक नहीं पहुंच सकीं। इसके बाद भारतीय मुक्केबाजी संघ (बीएफआई) की मूल्यांकन प्रक्रिया में तीसरे स्थान पर रहने के बावजूद उन्हें एशियाई चैंपियनशिप के लिए 54 किग्रा वर्ग में जगह नहीं मिली, जबकि प्रीति पवार ने उस स्पर्धा में स्वर्ण जीतकर कोटा हासिल किया। दो बड़े बहु-खेल आयोजनों में खेलने की इच्छा के चलते साक्षी ने एक बड़ा फैसला लिया और 51 किग्रा वर्ग में उतरने का निर्णय किया, जहां दो बार की विश्व चैंपियन निकहत जरीन का दबदबा माना जाता है। उन्होंने कहा, “मेरे लिए राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में जाना बहुत जरूरी था। मैं 2012 से पूरी मेहनत और अनुशासन के साथ अभ्यास कर रही हूं, इसलिए मैं यह मौका किसी भी हालत में नहीं खोना चाहती थी।” साक्षी के लिए हालांकि यह बदलाव आसान नहीं था क्योंकि वजन घटाना मुक्केबाजों के लिए बेहद कठिन प्रक्रिया होती है, खासकर तब जब गति और सहनशक्ति जीत-हार तय करती हो। साक्षी पहले ही 2022 की चोट के कारण राष्ट्रीय शिविर से बाहर हो गई थीं, जिससे वे पिछली बार के चयन ट्रायल्स में भी हिस्सा नहीं ले सकी थीं। दो बार की युवा और जूनियर विश्व चैंपियन होने के बावजूद उन्हें दोबारा अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने कहा, “यह बहुत मुश्किल समय था, लेकिन मुझे वापसी करनी थी। मैं बहुत भूखी थी कि इस बार कोटा जरूर हासिल करना है।” ट्रायल में उन्होंने पहले क्वार्टर फाइनल में तनु को हराया और फिर सेमीफाइनल व फाइनल में बेहतरीन रणनीति के साथ मुकाबले जीते। निकहत के खिलाफ मुकाबले में उन्होंने कहा, “मुझे पता था कि वह बहुत मजबूत इरादों वाली हैं। अगर मैं उनके मुक्कों के पहुंच में गई तो वह मुझे मौका नहीं देंगी। मेरी ताकत दूरी से खेलना और बायें मुक्के का इस्तेमाल करना है, इसलिए मैंने उसी पर ध्यान दिया।” उन्होंने अपनी रणनीति को पूरी तरह लागू किया और तेज मूवमेंट तथा सटीक जैब से निकहत को दूर रखा। यही रणनीति उन्होंने मौजूदा 48 किग्रा विश्व चैंपियनमीनाक्षी हुड्डा के खिलाफ भी अपनाई। साक्षी ने कहा, “मैं पहले भी 52 किग्रा में मीनाक्षी को हरा चुकी हूं, इसलिए मुझे भरोसा था कि मैं फिर कर सकती हूं। वह जवाबी प्रहार में बहुत खतरनाक हैं, इसलिए मैंने दूरी बनाए रखी और अपने खेल पर भरोसा किया।” वजन वर्ग बदलने का उनका फैसला भले ही मजबूरी में लिया गया था लेकिन यह अब उनके लिए नई उम्मीद बन गया है। उन्होंने कहा, “54 किग्रा में लड़कियां अक्सर मुझसे लंबी और ज्यादा ताकतवर होती थीं। लेकिन 51 किग्रा में मेरा कद और ताकत दोनों बेहतर संतुलित रहता है, इसलिए यह मेरे लिए ज्यादा अनुकूल है।” भाषा आनन्द नमितानमिता


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