खेल जगत के शांत स्तंभ राजा रणधीर सिंह का सफर

खेल जगत के शांत स्तंभ राजा रणधीर सिंह का सफर

खेल जगत के शांत स्तंभ राजा रणधीर सिंह का सफर
Modified Date: May 27, 2026 / 05:48 pm IST
Published Date: May 27, 2026 5:48 pm IST

नयी दिल्ली, 27 मई (भाषा) शाही खानदान से ताल्लुक रखने वाले, एक अभूतपूर्व निशानेबाज, एक कड़े प्रशासक, लेकिन सबसे बढ़कर ओलंपिक आंदोलन के आजीवन प्रमोटर रणधीर सिंह भारतीय खेलों की अक्सर शोर-शराबे वाली सत्ता के गलियारों में शांत और प्रभावशाली व्यक्तित्व की मिसाल थे।

कई तरह की स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से जूझ रहे सिंह (79 वर्ष) का बुधवार को यहां निधन हो गया। वह अपने पीछे खेल उत्कृष्टता और प्रशासनिक सूझबूझ की एक समृद्ध विरासत छोड़ गए जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का चेहरा बना दिया था।

वह पटियाला के पूर्व महाराजा भूपिंदर सिंह के वंशज थे जिससे उनके साथी उन्हें ‘राजा रणधीर’ कहकर बुलाते थे। एक मृदुभाषी और शांत स्वभाव वाले व्यक्ति सिंह का प्रभाव इतना गहरा था कि उन्हें अपनी अहमियत साबित करने के लिए कभी ढिंढोरा पीटने की जरूरत नहीं पड़ी।

महाराजा यादविंद्र सिंह के बेटे रणधीर सिंह ऐसे माहौल में पले-बढ़े जहां क्रिकेट का बल्ला, पोलो की छड़ें और बंदूकें शाही रीति-रिवाजों की तरह ही जीवन का एक अहम हिस्सा थीं। लेकिन उन्होंने खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर और खेलों की सेवा करके अपनी एक अलग पहचान बनाई।

उन्हें ओलंपिक आंदोलन और अंतरराष्ट्रीय खेल कूटनीति की ऐसी गहरी समझ थी, जिसकी बराबरी बहुत कम भारतीय प्रशासक कर पाते थे। यह बात अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के पूर्व अध्यक्ष थॉमस बाक के साथ उनकी दशकों पुरानी दोस्ती में साफ झलकती थी।

एक खिलाड़ी और खेल प्रशासक के तौर पर सिंह के नाम कई ऐसी उपलब्धियां दर्ज हैं जो उन्होंने सबसे पहले हासिल कीं।

वह एशियाई खेलों (1978 बैंकॉक, ट्रैप स्पर्धा) में निशानेबाजी में भारत के पहले स्वर्ण पदक विजेता थे। इसके अलावा 1994 में हिरोशिमा में हुए एशियाई खेलों के दौरान उन्होंने एक ऐसा बेमिसाल कारनामा कर दिखाया, जब उन्होंने निशानेबाजी स्पर्धा में हिस्सा लेने के साथ महाद्वीप की संचालन संस्था एशियाई ओलंपिक परिषद की कार्यकारी समिति के सदस्य के तौर पर भी अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।

इन उपलब्धियों में पांच बार ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेना और 1979 में अर्जुन पुरस्कार से नवाजा जाना भी शामिल है।

वह 2024 में एशियाई ओलंपिक परिषद (ओसीए) के अध्यक्ष बनने वाले पहले भारतीय बने, लेकिन इसी साल की शुरुआत में स्वास्थ्य कारणों से उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा।

उन्हें 2021 में उन्हें ओसीए का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया था और चीन के हांग्झोऊ में हुए 2022 के एशियाई खेल (कोविड के कारण देर से आयोजित हुए थे) उन्हीं की देखरेख में हुए थे।

वैश्विक ओलंपिक आंदोलन में सिंह एक बेहद अहम हस्ती थे। उन्होंने 2001 से 2014 तक आईओसी के पूर्ण सदस्य के तौर पर काम किया। उसके बाद उन्हें आईओसी का मानद सदस्य बना दिया गया। वह आईओसी के मानद सदस्य थे।

उन्होंने 1994 में निशानेबाजी से आधिकारिक तौर पर संन्यास लिया लेकिन इससे कई साल पहले ही खुद को एक प्रशासक के तौर पर तैयार कर लिया था। खेल प्रशासन में उनका पहला कदम 1984 में था, जब उन्हें भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) का संयुक्त सचिव चुना गया।

फिर 1987 में वह आईओए के महासचिव बन गए और 2012 तक इस पद पर बने रहे। इस दौरान उन्होंने 2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े विवादों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई बदनामी जैसी मुश्किलों का सामना किया, लेकिन उनकी ईमानदारी पर कोई दाग नहीं लगा। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि तब जब आईओए के पूर्व प्रमुख स्वर्गीय सुरेश कलमाड़ी जैसे लोगों को भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाना पड़ा था।

कलमाड़ी के साथ उनके रिश्ते इस बात का एक दिलचस्प उदाहरण थे कि आपसी मतभेदों के बावजूद काम की जगह पर कैसे सहयोग किया जा सकता है। सिंह ने अपनी गरिमा बनाए रखी और कभी भी अपनी तय सीमा से बाहर जाकर काम नहीं करके काफी सम्मान कमाया।

अगर कलमाड़ी वह राजनीतिक ताकत थे जो आईओए के अंदरूनी फैसलों को आकार देते थे तो सिंह एक शांत लेकिन प्रभावशाली संस्थागत आधार थे।

उस समय के ओसीए अध्यक्ष और ओलंपिक आंदोलन के एक बड़े नाम शेख अहमद अल-फहद अल-सबाह के भरोसेमंद साथी के तौर पर उन्होंने 1991 से 2015 तक ओसीए के महासचिव के रूप में काम किया।

उन्हें 2002 में राष्ट्रीय ओलंपिक समितियों के संघ की कार्यकारी परिषद का सदस्य बनाया गया।

सिंह भारत के सबसे जाने-माने खेल प्रशासकों में से एक थे। भारतीय खेलों के अक्सर बिखरे हुए प्रशासनिक ढांचे के बीच भी आम सहमति बनाने की उनकी काबिलियत के लिए उनकी बहुत प्रशंसा होती थी।

निशानेबाजी में उनकी विरासत को उनकी बेटी राजेश्वरी ने बरकरार रखा है। राजेश्वरी खुद भी एक ट्रैप निशानेबाज हैं, उन्होंने 2022 एशियाई खेलों में रजत पदक जीता था और उससे पहले 2016 की एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक अपने नाम किया था।

सिंह ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने खेल मंत्रालय के सामने यह तर्क दिया था कि भारतीय खेल प्रशासकों को खेल संहिता में तय की गई अवधि से भी ज्यादा समय के लिए अपने पदों पर बने रहने की जरूरत है। ऐसा करके उन्होंने उस आम राय के खिलाफ अपनी बात रखी थी जिसमें यह मांग की जा रही थी कि प्रशासकों की उम्र और उनके कार्यकाल की अवधि पर एक तय सीमा होनी चाहिए।

उनका मानना ​​था कि दुनिया के खेलों में प्रभाव रातों-रात नहीं बनाया जा सकता, और विदेशों में अपनी साख बनाने के लिए भारतीय अधिकारियों को अपने देश में काम में निरंतरता बनाए रखना जरूरी है।

वह मानते थे कि राष्ट्रीय महासंघों का नेतृत्व करने में कई साल बिता चुके प्रशासक ही अंत में आईओसी, ओसीए और अंतरराष्ट्रीय महासंघों जैसी संस्थाओं में प्रभावशाली पदों तक पहुंच सकते हैं। उन्हें लगता था कि अगर भारत दुनिया के खेलों में अपनी आवाज मजबूत करना चाहता है, तो यह बेहद जरूरी है।

भारत के ओलंपिक निशानेबाजी में बड़ी ताकत बनने से बहुत पहले ही सिंह देश के शुरुआती ट्रैप निशानेबाजों में से एक थे। 1960 और 1970 के दशक में जब निशानेबाजी को एक ऐसा खास खेल माना जाता था जिसके लिए बुनियादी ढांचा बहुत सीमित था और जिस पर लोगों का ध्यान भी बहुत कम जाता था, तब भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व पूरी शान के साथ किया।

भाषा नमिता मोना

मोना


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