(अजय मसंद)
नयी दिल्ली, 16 अप्रैल (भाषा) अपने शांत स्वभाव लेकिन मजबूत आत्मविश्वास वाली कैंडिडेट्स प्रतियोगिता की विजेता आर वैशाली अक्सर अपनी मां के साथ देखी जाती हैं और विश्व चैंपियनशिप में भाग लेने से पहले यही उनकी ताकत हैं।
वह एक ऐसी भारतीय खिलाड़ी हैं जो अपने खेल को ही अपनी पहचान बनने देती हैं।
वैशाली के लिए जो चीज सबसे महत्वपूर्ण है वह है उनके घर का माहौल। वह एक ऐसे परिवार से हैं जो पूरी तरह से शतरंज के प्रति समर्पित है और जिसने बिना किसी दिखावे के महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।
साइप्रस के पाफोस में खेले गए कैंडिडेट्स टूर्नामेंट में आठ महिला खिलाड़ियों में सबसे कम रेटिंग वाली खिलाड़ी वैशाली ने अपने शांत खेल और आत्मविश्वास से ही जीत हासिल करके अपनी काबिलियत साबित कर दी। उन्होंने बुधवार को कैटेरीना लैग्नो पर शानदार जीत हासिल करके इस साल के अंत में जू वेनजुन के खिलाफ विश्व चैंपियनशिप के मुकाबले में खेलने का अधिकार हासिल किया।
यह 24 वर्षीय खिलाड़ी लंबे समय तक अपने छोटे भाई आर प्रज्ञाननंदा के साये में ही रही। प्रज्ञाननंदा ने भी इस टूर्नामेंट में हिस्सा लिया लेकिन ओपन वर्ग में वह जल्द ही खिताब की दौड़ से बाहर हो गए थे।
प्रज्ञाननंदा की संभावनाएं धूमिल होने के बाद भी सारा ध्यान वैशाली पर नहीं गया, जिससे वह शायद निराशा हुई होगी। लेकिन हमेशा साड़ी पहने और शांत और भावहीन चेहरे के साथ उनके साथ रहने वाली उनकी मां की खामोश उपस्थिति उन्हें अपने काम पर ध्यान केंद्रित करने और यह याद दिलाने के लिए काफी थी कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।
वैशाली ने 8.5 अंक हासिल करके इस बार खिताब अपने नाम कर लिया। वह पिछले साल टोरंटो में संयुक्त रूप से दूसरे स्थान पर रहीं और विश्व चैंपियनशिप में जगह बनाने से चूक गईं थी।
कम बोलना और चुप रहना लंबे समय से उनकी खासियत रही है। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार में पली बढ़ी हैं। उनके पिता बैंक शाखा प्रबंधक के रूप में काम करते थे और उनकी मां गृहिणी थीं।
वैशाली दिसंबर 2023 में कोनेरू हम्पी और डी हरिका के बाद तीसरी भारतीय महिला ग्रैंडमास्टर बनीं। इसके बाद वह गुपचुप अपने खेल को आगे बढ़ाती रहीं।
उन्होंने आयु वर्ग के कई खिताब जीते और 2021 में अंतरराष्ट्रीय मास्टर का खिताब हासिल किया। इसके बाद 2022 में चेन्नई के मल्लापुरम में शतरंज ओलंपियाड में उन्होंने व्यक्तिगत कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उन्होंने टीम को भी कांस्य पदक दिलाने में मदद की।
कैंडिडेट्स प्रतियोगिता में भी उन्होंने अपना शांत आत्मविश्वास बनाए रखा। उन्हें इस प्रतियोगिता में कमजोर खिलाड़ी माना जा रहा था लेकिन उन्होंने केवल अपने खेल पर ध्यान केंद्रित किया और सभी धारणाओं को गलत साबित कर दिया।
नॉर्वे की शतरंज चैंपियन अन्ना मुज़िचुक, महिला विश्व रैपिड चैंपियन एलेक्जेंड्रा गोरियाचकिना, विश्व ब्लिट्ज चैंपियन बिबिसारा असाउबायेवा और चीन की दो सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी झू जिनर और पूर्व कैंडिडेट्स विजेता टैन झोंगयी जैसी दिग्गज खिलाड़ियों की मौजूदगी में उन्हें जीत का प्रबल दावेदार नहीं माना जा रहा था।
आलम यह था कि पिछले साल विश्व कप जीतने वाली भारत की दिव्या देशमुख को वैशाली से कहीं अधिक मजबूत दावेदार माना जा रहा था, लेकिन उन्होंने इन सब बातों पर ध्यान नहीं दिया और चुपचाप शीर्ष पर पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत करती रहीं।
अब जबकि वह कैंडिडेट्स प्रतियोगिता जीत चुकी है तो सबकी निगाह विश्व चैंपियनशिप में उनके प्रदर्शन पर टिकी रहेगी। यह कहना गलत नहीं होगा कि वैशाली अपनी मां से ताकत और आत्मविश्वास हासिल करेंगी जो हमेशा की उनके आसपास रहेंगी।
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