रायपुर। छत्तीसगढ़ में 15 साल से अटका एक फैसला आखिर मुकम्मल हुआ। राज्य सरकार ने शिक्षाकर्मियों के मर्जर को हरी झंडी दे दी। अब इस फैसले के सियासी मकसद पर बात जा सकती है, क्योंकि मर्जर से केवल शिक्षाकर्मियों को ही नहीं बल्कि सरकार को भी फायदा होगा। चुनावी साल में 1 लाख से ज्यादा परिवारों को जो राहत सरकार ने दी है। वो उन परिवारों को ज़रूरी तौर पर फील गुड कराएगा पर सवाल ये है कि क्या ये फील गुड फैक्टर बीजेपी के पक्ष में वोट के रूप में भी कन्वर्ट हो पाएगा?
लंबा इंतजार, लंबी जद्दोजहद, लंबा सस्पेंस, फिर आया क्लाईमैक्स। लीजिए हो गई मांग पूरी। शिक्षाकर्मियों के संविलियन को मिल गई मंजूरी। बीते बरसों में शिक्षाकर्मियों ने हफ्तों लंबे आंदोलन किए पर हर बार मिला उन्हें आश्वासन। इस बार न आंदोलन, न हड़ताल, सिर्फ दबाव काम कर गया, टाइमिंग जो मुफीद थी।
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चुनावी दौर में अगर सरकार के सामने आ खड़ा हो एक संगठित समूह, जिसके पास डेढ़ लाख से ज्यादा सदस्य हों तो सरकार को सोचना ही पड़ता है। इतने लोगों को नाराज़ करने का जोखिम चौथी जीत की राह में कांटे बिछा सकता था। फिर पड़ोसी मध्यप्रदेश ने जब संविलियन कर दिया तब तो भी चारा भी नहीं बचा। आखिर शिक्षाकर्मियों से जुड़ी तमाम विसंगतियां वहीं से विरासत में यहां आई थीं।
ख़ैर सरकार ने थोड़ा रुककर सोचा-समझा और वो फैसला किया जो न केवल शिक्षाकर्मियों की बरसों पुरानी प्रतीक्षा को खत्म करने वाला है बल्कि सरकार की भी चुनावी संभावनाओं को थोड़ी लिफ्ट कराने में सक्षम है। आखिर संविलियन की संजीवनी बंट गई। इस संजीवनी से फौरी तौर पर शिक्षाकर्मियों के करियर को नया पंख लग जाएगा और आए दिन वाले वाले हड़ताल से स्कूल मुक्त हो जाएंगे। पर किस्सा केवल इतना ही नहीं है। बल्कि चुनावी रण में संविलियन सरकार के लिए ‘मास्टर की‘ साबित हो सकती है।
तो क्या सरकार ने सोच-समझकर ये फैसला किया है। क्या चुनावी बढ़त लेने में इस फैसले की अहम भूमिका रहने वाली है। सवाल ये भी कि क्या इस फैसले के ज़रिए सरकार ने विपक्ष की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं?
वेब डेस्क, IBC24