महासमुंद। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है छत्तीसगढ़ की महासमुंद विधानसभा सीट की। पिछले चुनाव में यहां की जनता ने निर्दलीय प्रत्याशी विमल चोपड़ा को अपना विधायक चुना। ऐसे में विधायक विमल चोपड़ा के सामने चुनौती थी कि वे क्षेत्र की जनता के उम्मीदों पर खरा उतरें। चुनावी साल है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि विमल चोपड़ा ने पिछले चुनाव में जो वादे किए थे। उन पर धरातल में कितना काम हुआ। पिछले पांच साल के कार्यकाल में उनके क्षेत्र का कितना विकास हुआ। पहले एक नजर डाल लेते है महासमुंद विधानसभा क्षेत्र के सियासी समीकरण पर।
महासमुंद जिले की चार विधानसभा सीटों में से एक महासमुंद विधानसभा छत्तीसगढ़ की राजनीति में कई मायनों मे खास है। खास इसलिए कि महासमुंद श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल जैसे नेताओं की सियासी जमीन रही है। ये सीट कांग्रेस के गढ़ मानी जाती है। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में यहां की जनता ने कांग्रेस और बीजेपी के प्रत्याशियों को दरकिनार करते हुए निर्दलीय विमल चोपड़ा को अपना विधायक चुना।
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वैसे महासमुंद में पिछले कुछ सालों से कांग्रेस के अग्नि चंद्राकर और बीजेपी के पूनम चंद्राकर के बीच ही नूराकुश्ती होती आई है। 1998 में इस सीट से कांग्रेस के अग्नि चंद्राकर पहली बार यहां से चुनाव जीते। 2003 में भी कांग्रेस ने अग्नि चंद्राकर को मौका दिया। लेकिन इस बार उन्हें बीजेपी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे पूनम चंद्राकर के हाथों हार का सामना करना पड़ा। 2008 में अग्नि चंद्राकर ने बीजेपी के मोतीलाल साहू को शिकस्त देकर सीट को कांग्रेस के पाले में डाल दिया। वहीं 2013 में बीजेपी ने पूनम चंद्राकर को फिर से टिकट दिया। तो कांग्रेस ने अग्नि चंद्राकर पर ही भरोसा जताया। लेकिन जनता ने दोनों प्रत्याशियों को नकारते हुए बीजेपी से बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़े विमल चोपड़ा ने बाजी मारी। इस चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी विमल चोपड़ा 47हजार416 को वोट मिले। वहीं बीजेपी प्रत्याशी पूनम चंद्राकर को 39 हजार 609 मत मिले। जबकि कांग्रेस से तीन बार विधायक रह चुके अग्नि चंद्राकर 32818 वोट लेकर तीसरे पायदान पर रहे।
एक लाख 89 हजार 105 मतदाता वाले महासमुंद विधानसभा क्षेत्र में 38 फीसदी शहरी और 62 फीसदी ग्रामीण वोटर्स हैं, जो चुनाव में नेताओं के किस्मत का फैसला करेंगे। सीट के जातिगत समीकरण की बात करें, तो 26 फीसदी आदिवासी वोटर्स हैं। इसके अलावा अनुसूचित जाति के 14, अल्पसंख्यक के 11 और सामान्य वोटर 9 फीसदी हैं। वहीं 12 फीसदी साहू, 5 फीसदी यादव, 4 फीसदी कुर्मी सहित पिछड़ा वर्ग के 19 फीसदी मतदाता भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करते हैं।
जैसे-जैसे सियासी महासमर 2018 का वक्त नजदीक आ रहा है। महासमुंद की राजनीति में हलचल शुरू हो गई है। पिछले चुनाव में चौंकाने वाला परिणाम देकर यहां की जनता ने राजनीतिक दलों को सोचने पर जरूर मजबूर किया है। लिहाजा इस सीट पर दोनों दल प्रत्याशी चयन में हड़बड़ी करने के मूड में नहीं हैं।
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मुद्दों की बात करें तो महासमुंद विधानसभा क्षेत्र में किसानों की समस्या सबसे बड़ा मुद्दा है। इस क्षेत्र के किसान समय समय पर खेती से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। वहीं औद्योगिक विकास नहीं होने से रोजगार की कमी है। इस क्षेत्र में लंबित पड़े विकास कार्य हर बार चुनाव में मुद्दा बनते हैं, लेकिन समस्याओं का समाधान हो नहीं पाता, छोटे बड़े मुद्दों के साथ महासमुंद विधानसभा फिर से चुनाव के लिए तैयार है।
महासमुंद में रेलवे लाइन है, जो महासमुंद विधानसभा क्षेत्र को दो हिस्सों में बांटती है और बरसों से यहां के लिए सियासी मुद्दा बना हुआ है। यहां लंबे समय से ओव्हरब्रिज का काम जारी है, लेकिन इसके एक हिस्से में निर्माण कार्य समाप्त होने की कगार पर है तो दूसरी अबतक काम शुरू भी नहीं हुआ है..जिसे लेकर यहां के लोगों में नाराजगी साफ देखी जा सकती है। आने वाले चुनाव में केवल ओव्हरब्रिज का मुद्दा ही नहीं बल्कि नेताओँ को किसानों की नाराजगी भी झेलनी पड़ सकती है। दरअसल महासमुंद विधानसभा क्षेत्र के किसानों को बीमा और फसल क्षतिपूर्ति का लाभ नहीं मिला, जिसे लेकर समय-समय पर वो आंदोलन भी करते रहे हैं। वहीं खेती करने के लिए वो काफी हद तक कोडार डैम के पानी पर निर्भर हैं। लेकिन समय पर उन्हें पानी नहीं दिया जाता। धान के अलावा अन्य फसल लेने वाले किसानों के लिए कोल्ड स्टोरेज की कमी भी यहां बरसों से महसूस की जा रही है।
महासमुंद शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी फेल नजर आता है। कहने को तो यहां कॉलेज है लेकिन शिक्षकों की कमी के कारण पढ़ाई का स्तर लगातार गिर रहा है। दूरदराज से पढ़ने के लिए आने वाले छात्रों के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा नहीं है। क्षेत्र में कोई बड़ा व्यापारिक केंद्र नहीं होने की वजह से जिले में व्यापार तेजी नहीं पकड़ पा रहा है और बेरोजगारों की संख्या भी बढ़ी है। ओडिशा से लगे होने के कारण यहां यातायात का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन अब तक महासमुंद में रिंग रोड का निर्माण कार्य नहीं हो पाया है।
चुनाव नजदीक है तो इन मुद्दों को अब सियासी रंग भी दिया जाने लगा है। कांग्रेस और बीजेपी क्षेत्र में विकास की सुस्त रफ्तार के लिए निर्दलीय विधायक विमल चोपड़ा को जिम्मेदार मानते हैं। तो वहीं विधायक महोदय के पास भी इन आरोपों का जवाब तैयार है। कुल मिलाकर महासमुंद में आगामी सियासी जंग किसानों, औदयोगिक विकास, रोजगार, अधूरे पड़े निर्माण कार्य जैसे मुद्दों से लड़ा जाएगा। सभी दल एक दूसरे पर जिम्मेदारियों को लेकर दोषारोपण कर रहे हैं, लेकिन समस्याओं के समाधान को लेकर जायज चिंता नजर नहीं आती।
सियासी महासमर 2018 का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। आरोप-प्रत्यारोप के बीच महासमुंद में नेता टिकट की आस में जनता दरबार में हाजिरी भी लगाने लगे हैं। शहरी और ग्रामीण मतदाताओं के बीच दोनों सियासी दल जनता के दिल में पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच सियासी समीकरण साधने की कोशिश करते आधा दर्जन दावेदार दौड़ लगा रहे हैं। कुछ संशय निर्दलीय को दल से चुनाव लड़ने को लेकर है तो कुछ जातिगत समीकरण के बीच जीतने वाले उम्मीदवार पर दांव लगाने की चाल चली जा रही है।
महासमुंद में वैसे तो कांग्रेस और बीजेपी के प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते रहे हैं। लेकिन 2013 के विधानसभा चुनाव में यहां की जनता ने सबको चौंकाते हुए निर्दलीय विमल चोपड़ा को अपना नेता चुना। हालांकि विमल चोपड़ा बीजेपी और संघ परिवार से आते थे और बीजेपी से टिकट नहीं मिलने की स्थिति में बागी हुए थे। कुछ पुराने साथियों और जनता के बीच लोकप्रिय होने के कारण वो विधानसभा पहुंचने में सफल हुए, लेकिन इस बार यहां समीकरण कुछ बदले नजर आ रहे हैं। चुनावी साल है तो विमल चोपड़ा एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में हो सकते हैं। हालांकि सियासी गलियारों में चर्चा है कि वे बीजेपी से चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन फिलहाल इस पर मुहर नहीं लगी है।
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वहीं पिछली बार निर्दलीय प्रत्याशी के हाथों शिकस्त खाने वाले बीजेपी और कांग्रेस से कई नेता इस बार अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। बीजेपी की बात करें तो पूर्व विधायक पूनम चंद्राकर टिकट के स्वाभाविक दावेदार हैं। पूनम चंद्राकर मानते हैं कि पिछली बार पार्टी के दो लोगों के चुनाव लड़ने से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इनके अलावा जिलाध्यक्ष इंद्रजीत सिंह गोल्डी भी बीजेपी से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। बीजेपी अगर किसी नए चेहरे को मौका देती है तो इंद्रजीत को अवसर मिल सकता है।
कांग्रेस की बात करें तो ज्यादातर पुराने चेहरे ही टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। अग्नि चंद्राकर का दावा एक बार फिर मजबूत है। अग्नि चंद्राकर महासमुंद से 6 बार चुनाव लड़ चुके हैं, जिसमें से 3 बार जीते जबकि 3 बार उन्हें शिकस्त मिली। अग्नि चंद्राकर के अलावा महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष अनिता रावटे भी टिकट के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं, वहीं नए चेहरों में पूर्व जिलाध्यक्ष अमरजीत चावला भी दावेदारों में शामिल हैं। अमरजीत चावला करीब 3 साल तक कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रहे लेकिन अब विधायक की टिकट की आस में हैं। बीजेपी-कांग्रेस के अलावा JCCJ और बसपा भी इस सीट से उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं। हालांकि JCCJ से कौन उम्मीदवार होगा अब तक ये तय नहीं हो सका है। एक समाज से बार–बार विधायक बनाने की नाराजगी की वजह से 13 के चुनाव में दोनों दलों को यहां मुंह की खानी पड़ी। इस चुनाव में राजीनीतिक दल पुरानी भूल दोहराने से बच रहे हैं। देखना है इस बार भी राजनीतिक दल वही पुराने या नए चेहरों को मौका देते हैं।
वेब डेस्क, IBC24
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