प्रोन्नति पर विचार करते समय तदर्थ सेवा को नजरअंदाज नहीं कर सकते: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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प्रोन्नति पर विचार करते समय तदर्थ सेवा को नजरअंदाज नहीं कर सकते: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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  • Publish Date - March 20, 2026 / 11:41 PM IST,
    Updated On - March 20, 2026 / 11:41 PM IST

लखनऊ, 20 मार्च (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को कहा कि कर्मचारियों की प्रोन्नति पर विचार करते समय उसकी तदर्थ सेवाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता बशर्ते शुरुआती नियुक्ति एक कानूनी प्रक्रिया के जरिए की गई हो और कर्मचारी ने निरंतर सेवा दी हो।

न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार की दो विशेष अपीलों को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी और याचिकाकर्ताओं के पक्ष में पूर्व के आदेश को सही ठहराया।

अदालत ने कहा कि कर्मचारी को नियमित किए जाने के बाद प्रोन्नति के लिए पात्रता निर्धारित करते समय उसकी तदर्थ सेवा को अवश्य गिना जाना चाहिए। यदि कनिष्ठ कर्मचारी को पहले ही प्रोन्नत किया जा चुका है तो एक वरिष्ठ कर्मचारी उसी तिथि से प्रोन्नति पाने का हकदार होगा, भले ही उसे बाद में नियमित किया गया हो।

यह मामला अनिल कुमार और शैलेंद्र सिंह नाम के व्यक्तियों से जुड़ा है जिन्हें 1986 में आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में तदर्थ आधार पर अवर अभियंता के तौर पर नियुक्त किया गया था और बाद में नियमित किया गया।

विवाद तब शुरू हुआ जब इन व्यक्तियों की नियुक्ति के बाद नियुक्त हुए कर्मचारियों को 18 जनवरी, 1995 से सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नत कर दिया गया, जबकि इन याचिकाकर्ताओं को प्रोन्नति का लाभ देने से मना कर दिया गया।

इससे पूर्व, एकल न्यायाधीश की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को राहत दी थी जिसे चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने दलील दी कि चूंकि याचिकाकर्ता उस समय नियमित कर्मचारी नहीं थे, इसलिए उन्हें पिछली तिथि से प्रोन्नति नहीं दी गई।

इस दलील को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को प्रोन्नति का लाभ देने से मना करना अन्याय होगा।

भाषा सं राजेंद्र सुरभि

सुरभि