लखनऊ के किसानों का समूह नील की खेती की राह पर, भारी मुनाफे की उम्मीद

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लखनऊ के किसानों का समूह नील की खेती की राह पर, भारी मुनाफे की उम्मीद

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  • Publish Date - July 17, 2022 / 12:43 PM IST,
    Updated On - November 29, 2022 / 08:26 PM IST

(चंदन कुमार)

लखनऊ, 17 जुलाई (भाषा) उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गांवों में अब नील की खेती की संभावना बढ़ गई है और कुछ किसान नील की खेती को अपना रहे हैं क्योंकि उन्हें इसमें भारी मुनाफे की उम्मीद नजर आ रही है।

हर्बल डाई निर्माता यावर अली शाह ने दो साल पहले मुनाफे में सुधार के लिए लखनऊ के बाहरी इलाके में नील की खेती शुरू की क्योंकि इसे तमिलनाडु के खेतों में करना अपेक्षाकृत ज्यादा महंगा था। शाह ने क्षेत्र के सांडा गांव में किसानों को प्रोत्साहित किया जिसके बाद किसानों के एक समूह ने नील की खेती शुरू की है। किसान क्षेत्र में लोकप्रिय नकदी फसल पेपरमिंट की खेती के माध्यम से कमाई की तुलना में नील की खेती में काफी अधिक कीमत पाने की उम्मीद कर रहे हैं।

इसका वैज्ञानिक नाम इंडिगोफेरा टिंक्‍टोरिया कहा जाता है, जिसे स्‍थानीय भाषा में ‘नील’ कहा जाता है। नील की साल में दो बार कटाई की जा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी खेती से मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार होता है। सांडा गांव के राम खिलाड़ी कहते हैं, ‘‘हमने डेढ़ हेक्टेयर में नील की खेती की है। जल्द ही पौधे की कटाई कर ली जाएगी और हमें उपज की अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद है।’’ पहले ये किसान पेपरमिंट की खेती को प्राथमिकता दे रहे थे।

पेपरमिंट के बजाय नील की खेती को चुनने का कारण पूछे जाने पर मोहम्मद वसीफ ने बताया, ‘‘पेपरमिंट की उत्पादन लागत कमाई से अधिक है। इस वजह से इसकी खेती करना बहुत मुश्किल हो गया है और हम एक और फसल की खेती करना चाह रहे थे जिससे हमें कुछ पैसे मिल सके।’’

किसानों को बीज मुहैया कराने वाली कंपनी के मालिक शाह ने उनकी पूरी फसल खरीदने का वादा किया है। शाह ने बताया, ‘‘प्राकृतिक नील की मौजूदा कीमत को देखते हुए किसानों को पेपरमिंट की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक धन की प्राप्ति होगी।’’ शाह ने कहा, ‘‘हम दुनिया में प्राकृतिक नील रंग के प्रमुख निर्यातकों में से एक हैं। वस्त्र उद्योग में इसके लिए जोर देने के बाद डाई की मांग काफी बढ़ गई है।’’

प्राकृतिक नील रंग की क्षमता के बारे में शाह कहते हैं कि मांग को देखते हुए वैश्विक बाजार में एक लाख हेक्टेयर से अधिक फसल आसानी से समायोजित की जा सकती है। अन्य किसान भी नील की खेती के लिए अपना मन बना रहे हैं और परिणाम का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

किसान संतोष सिंह कहते हैं, ‘‘इस साल हमारे गांव के कुछ किसानों ने नील की खेती की है। अगर उन्हें अच्छा मुनाफा होता है तो हम अगले साल से इस फसल की खेती करेंगे।’’

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, एक बार उगाई गई नील की फसल को किसान साल में दो बार काट सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के धर्मेंद्र कुमार गुप्ता ने कहा, ‘‘नील को उर्वरकों की बहुत कम या न के बराबर आवश्यकता होती है और इसे आवारा मवेशी नहीं खाते हैं। इससे फसल के नुकसान की संभावना कम हो जाती है। यदि क्षेत्र में किसानों द्वारा उत्पादित नील को अच्छी दरों पर खरीदा जाता है तो यह फसल उनके लिए किसी भी अन्य पारंपरिक नकदी फसल की तुलना में फायदेमंद होगी।’’

गुप्ता ने कहा कि नील की जड़ों में नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया युक्त नोड्यूल होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता में सुधार करते हैं। गुप्ता ने कहा, ‘‘किसान अपने खेतों में पारंपरिक फसलों के साथ नील की खेती करके इस पहलू का फायदा उठा सकते हैं।’’

अधिकारी ने कहा कि नील की खेती का अन्य लाभ यह है कि किसान इसे सीधे खरीदारों को बेच सकते हैं, जबकि पेपरमिंट की खेती में किसान पौधे के अंकुर को काटते हैं और इसे तेल निकालने के लिए एक रिफाइनरी में ले जाते हैं। निकाले गए तेल को फिर व्यापारियों को बेच दिया जाता है, जबिक नील की खेती में किसान पूरे पौधे को जड़ से कुछ सेंटीमीटर ऊपर काटकर नील उत्पादकों को बेच देते हैं। पूरे तने का उपयोग डाई को निकालने के लिए किया जाता है जिसे बिक्री से पहले सूखाया जाता है।

भाषा चंदन आनन्द नेत्रपाल सुरभि

सुरभि