लखनऊ, 17 अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने सीतापुर जिले में नजूल सरकारी भूमि पर कथित कब्जे से जुड़े मामले में कांग्रेस को अंतरिम राहत देने से सोमवार को इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो सके कि विवादित सरकारी भूमि उन्हें विधिवत आवंटित की गई थी।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कांग्रेस कमेटी, सीतापुर की ओर से दाखिल रिट याचिका पर यह आदेश पारित किया।
याचिका में सीतापुर नगर पालिका परिषद के कार्यपालक अधिकारी (प्रभारी) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें मोहल्ला टामसेनगंज स्थित प्लॉट संख्या 244/1 के अभिलेखों से याचिकाकर्ताओं के नाम हटाने और भूमि से कब्जा हटाने का आदेश दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि वे घंटाघर के ऊपरी हिस्से में स्थित परिसर संख्या 1/6 पर वर्ष 1971 से काबिज हैं। उन्होंने वर्ष 1971 में 320 रुपये किराये के रूप में जमा किए जाने की रसीद भी अदालत में पेश की।
हालांकि, अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि पिछले करीब 55 वर्षों से कोई किराया जमा नहीं किया गया है और भूमि के वैध आवंटन या कब्जे के समर्थन में कोई समझौता अथवा आवंटन पत्र भी पेश नहीं किया गया।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि नजूल भूमि सरकारी संपत्ति है और कोई भी राजनीतिक दल उस पर अनधिकृत रूप से कब्जा नहीं कर सकता।
अदालत ने भी कहा कि केवल लंबे समय तक जमे रहने से सरकारी भूमि पर कब्जा वैध नहीं हो जाता। वैध कब्जे के लिए कम से कम आवंटन आदेश या कोई अन्य संबंधित दस्तावेज होना जरूरी है, लेकिन याचिकाकर्ता ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सके।
उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।
मामले की अगली सुनवाई एक अक्टूबर को होगी।
भाषा सं जफर खारी
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