लखनऊ, 17 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बृहस्पतिवार को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी अभिषेक प्रकाश को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ शुरू की गई सतर्कता जांच को रद्द कर दिया।
यह जांच एक औद्योगिक परियोजना की प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों से जुड़ी शिकायत के आधार पर शुरू की गई थी।
न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने प्रकाश की याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार द्वारा 20 मार्च और 28 मार्च 2025 को जारी आदेशों और सतर्कता जांच की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
एक कंपनी के अधिकारी ने 20 मार्च 2025 को एक शिकायत दर्ज करायी थी, जिसके बाद यह मामला शुरू हुआ था।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि ‘इन्वेस्ट यूपी’ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उसे निकांत जैन का मोबाइल नंबर दिया था और कहा था कि वह संबंधित परियोजना को अधिकार प्राप्त समिति और कैबिनेट से मंजूरी दिलाने के लिए जैन से संपर्क करे।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि जैन ने परियोजना की लागत का पांच प्रतिशत हिस्सा मांगा था, जिसके बाद जैन के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था, जबकि प्रकाश के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गयी थी और उसी दिन प्रकाश के खिलाफ सतर्कता विभाग से जांच की मांग से संबंधित एक पत्र भी भेजा गया था।
मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ उस वक्त आया जब निकांत जैन से जुड़े मामले में उच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में कंपनी के अधिकारी बिस्वजीत दत्ता ने कहा कि 20 मार्च 2025 की शिकायत गलतफहमी की वजह से की गयी थी और बाद में उन्हें पता चला कि परियोजना के लिए यीडा और उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड से जमीन की उपलब्धता और अन्य मुद्दों से जुड़ी जानकारी का इंतजार किया जा रहा था।
जरूरी जानकारी शामिल किए जाने के बाद 25 मार्च 2025 को उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा विचार के लिए प्रस्ताव की सिफारिश की गयी।
कंपनी ने सोलर सेल और सोलर मॉड्यूल निर्माण इकाई लगाने के लिए तीन दिसंबर 2024 को ‘इन्वेस्ट यूपी’ में आवेदन किया था। इस प्रस्ताव पर 24 फरवरी, 12 मार्च और 25 मार्च, 2025 को हुई मूल्यांकन समिति की बैठकों में विचार किया गया था।
प्रकाश की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने तर्क दिया कि कंपनी की परियोजना मूल्यांकन समिति के पास विचाराधीन थी और आखिरकार इसे 25 मार्च 2025 को उच्चाधिकार प्राप्त समिति के सामने रखने की सिफारिश की गयी।
उन्होंने बताया कि शिकायतकर्ता ने खुद बाद में उच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर कहा था कि उसने गलतफहमी में आकर वह शिकायत की थी।
मेहरोत्रा ने तर्क दिया कि बिना हलफनामे वाली शिकायत के आधार पर और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार राज्य सतर्कता समिति की मंजूरी लिये बिना सतर्कता जांच शुरू करना संबंधित सरकारी आदेशों के खिलाफ था।
हालांकि मुख्य स्थायी अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि सरकार ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए सतर्कता जांच का आदेश देने का फैसला किया था।
उन्होंने कहा कि कंपनी अधिकारी की शिकायत को महज मनगढ़ंत नहीं माना जा सकता और संबंधित सरकारी आदेशों के अनुसार मामले की सतर्कता जांच की जा सकती है।
बहरहाल, पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि समूह-क के अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों के साथ शपथपत्र लगाने की शर्त ईमानदार अधिकारियों को झूठी या मनगढ़ंत शिकायतों के आधार पर परेशान होने से बचाने के लिए निर्धारित की गई थी।
अदालत ने यह भी पाया कि विभागीय कार्यवाही शुरू होने के बावजूद, अधिकारियों ने नतीजों का इंतजार किए बिना और निर्धारित प्रक्रिया से राज्य सतर्कता समिति से मंजूरी लिए बगैर मामले को सतर्कता जांच के लिए भेज दिया।
अदालत ने माना कि जब शिकायतकर्ता ने खुद बाद में स्वीकार कर लिया कि शिकायत गलतफहमी के कारण की गई थी तो उस शिकायत पर कार्यवाही का आधार ही खत्म हो गया, लिहाजा अदालत ने सरकारी आदेशों और आईएएस अफसर अभिषेक प्रकाश के खिलाफ पूरी सतर्कता जांच को रद्द कर दिया।
भाषा सं. सलीम गोला
गोला