भक्तों की संख्या से मंदिर का प्रबंधन करने वाले न्यास का सार्वजनिक चरित्र स्थापित नहीं होता: अदालत

भक्तों की संख्या से मंदिर का प्रबंधन करने वाले न्यास का सार्वजनिक चरित्र स्थापित नहीं होता: अदालत

भक्तों की संख्या से मंदिर का प्रबंधन करने वाले न्यास का सार्वजनिक चरित्र स्थापित नहीं होता: अदालत
Modified Date: May 31, 2026 / 12:16 am IST
Published Date: May 31, 2026 12:16 am IST

लखनऊ, 30 मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि केवल लोगों के मंदिर दर्शन करने मात्र से ही मंदिर का प्रबंधन करने वाले न्यास का सार्वजनिक चरित्र सिद्ध नहीं हो जाता।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने शुक्रवार को दो याचिकाओं को खारिज करते हुए यह बात कही।

इन याचिकाओं में दावा किया गया था कि श्री राम लक्ष्मण-जानकी विराजमान मंदिर न्यास एक सार्वजनिक धार्मिक न्यास है और दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 92 के तहत इसके प्रशासन में हस्तक्षेप किया जा सकता है।

दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 92 सार्वजनिक धर्मार्थ और धार्मिक न्यासों पर लागू होती है।

यह अदालतों को न्यास भंग के मामलों में हस्तक्षेप करने, न्यासियों को हटाने या प्रशासनिक योजनाएं लागू करने के लिए कानूनी तंत्र प्रदान करती है।

विवाद, न्यास के प्रबंधन और उसके प्रबंधक की नियुक्ति से संबंधित था। अपीलकर्ताओं ने 2022 के अधीनस्थ न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए दलील दी कि मंदिर एक सार्वजनिक धार्मिक न्यास है और नए प्रबंधक की नियुक्ति सहित इसके प्रशासन में हस्तक्षेप सीपीसी की धारा 92 के तहत अनुरोध किया जा सकता है।

दूसरी ओर, न्यास ने दलील दी कि मंदिर और न्यास की स्थापना गुलजारी लाल ने अपने आवासीय परिसर में की थी और इसका प्रशासन हमेशा संस्थापक द्वारा तैयार की गई एक निजी योजना के अनुसार ही होता रहा है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पूजा के लिए मंदिर में सार्वजनिक पहुंच अपने आप में, किसी न्यास के सार्वजनिक चरित्र को स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने पाया कि न्यास का नियंत्रण व प्रबंधन संस्थापक और उनके उत्तराधिकारियों के पास ही रहा था और न्यास की संपत्तियां मंदिर के रखरखाव के लिए समर्पित थीं।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि न्यास का स्वरूप निजी था।

भाषा सं जफर जितेंद्र

जितेंद्र


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