इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ के जिला मजिस्ट्रटे, अपर जिला मजिस्ट्रेट (न्यायिक) पर खर्चा लगाया

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ के जिला मजिस्ट्रटे, अपर जिला मजिस्ट्रेट (न्यायिक) पर खर्चा लगाया

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  • Publish Date - May 30, 2026 / 10:27 PM IST,
    Updated On - May 30, 2026 / 10:27 PM IST

लखनऊ, 30 मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर काम करने और वैधानिक अधिकार के बिना कार्यवाही शुरू करने को लेकर लखनऊ के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) और अपर जिला मजिस्ट्रेट (न्यायिक) पर प्रत्येक पर 20,000 रुपये का व्यक्तिगत खर्चा लगाया है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि इन अधिकारियों के कार्यों ने याचिकाकर्ता को अनावश्यक रूप से परेशान किया है।

न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने ‘निवास कॉलोनाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड‘ की याचिका पर 20 मई को यह आदेश सुनाया।

उच्च न्यायालय ने एडीएम (न्यायिक) द्वारा 10 मार्च, 2026 को जारी किये गये उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कंपनी को विवादित भूमि बेचने और उस पर निर्माण गतिविधियां करने से रोक दिया गया था।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि विवादित संपत्ति से कोई स्पष्ट संबंध नहीं होने के बाद भी वकील आर पी सिंह ने पहले कंपनी को कानूनी नोटिस दिया और बाद में जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दायर की।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जमीन अवैध रूप से हस्तांतरित की गई थी और उस पर निर्माण कार्य किया जा रहा है।

जिला मजिस्ट्रेट ने को एडीएम (न्यायिक) को भेज दिया, जिन्होंने कोई स्पष्ट राय/कारण दर्ज किए बिना अंतरिम प्रतिबंध आदेश पारित किया।

उच्च न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धाराओं 104 और 105 के तहत कार्यवाही केवल उप जिलाधिकारी (एसडीएम) द्वारा शुरू की जा सकती है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि नियम 103 में व्यवस्था दी गयी है कि कोई कार्रवाई करने से पहले लेखपाल से एक रिपोर्ट प्राप्त करना और एसडीएम द्वारा संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया जाना अनिवार्य है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि मौजूदा मामले में निर्धारित प्रक्रिया को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि वकील ने याचिकाकर्ता को डराने और ब्लैकमेल करने के प्रयास में अपने कानूनी ज्ञान का दुरुपयोग किया था।

उसने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने मामले को दर्ज करने में अधिकार क्षेत्र के बिना काम किया, जबकि एडीएम (न्यायिक) ने कानूनी रूप से आवश्यक स्पष्ट कारण और उचित दिमाग लगाये बगैर आदेश पारित कर दिया।

एडीएम के आदेश को रद्द करते हुए, अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट और एडीएम (न्यायिक) दोनों को छह सप्ताह के भीतर अपने व्यक्तिगत खातों से 20,000 रुपये की लागत का भुगतान करने का निर्देश दिया।

अदालत ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि राशि का भुगतान सरकारी निधि से नहीं किया जाएगा।

भाषा सं अरूनव जफर

राजकुमार

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