लखनऊ, 23 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बृहस्पतिवार को एक अहम फैसले में कहा कि किसी मृत व्यक्ति के नाम पर जारी किया गया आय कर पुनर्मूल्यांकन नोटिस ‘शुरुआत से ही अमान्य’ होता है और इसे बाद में कानूनी उत्तराधिकारी का नाम जोड़कर या इसे प्रक्रियात्मक गलती मानकर वैध नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही और उसके बाद की कर मांग को रद्द करते हुए संसद से कानून में संशोधन करने पर विचार करने का भी आग्रह किया ताकि ऐसे मामलों से सामने आई कानूनी खामी को दूर किया जा सके।
अदालत ने निर्देश दिया कि फैसले की एक प्रति समुचित विचार के लिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय को भेजी जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंड पीठ ने आशा दुबे द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए दिया।
याचिका के अनुसार आशा दुबे के पति संजय दुबे का जनवरी 2024 में निधन हो गया था और उनकी मृत्यु के बावजूद आय कर विभाग ने मार्च 2025 में आयकर अधिनियम की धारा 148 के तहत एक नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि ओमैक्स ग्रुप पर तलाशी के दौरान 27.44 लाख रुपये के अघोषित नकद लेनदेन का पता चला था।
विभाग का दावा था कि यह रकम मृतक ने एक फ्लैट खरीदने के लिए नकद के तौर पर दी थी। इसके बाद विभाग ने उनकी पत्नी (कानूनी उत्तराधिकारी) के खिलाफ कार्यवाही की और लगभग 39.67 लाख रुपये के कर की मांग की।
पीठ ने कहा कि धारा 148 के तहत वैध नोटिस ही पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही का आधार होता है और किसी मृत व्यक्ति के नाम पर जारी नोटिस में अधिकार क्षेत्र से जुड़ी ऐसी बुनियादी कमी होती है जिसे एक्ट की धारा 292 बी के तहत ठीक नहीं किया जा सकता।
पीठ ने यह भी साफ किया कि धारा 159 के तहत कानूनी प्रतिनिधि के खिलाफ कार्यवाही तभी की जा सकती है जब कर देने वाले व्यक्ति के जीवित रहते ही वैध कार्यवाही शुरू कर दी गई हो।
अदालत ने यह भी कहा कि हालांकि मृत्यु के बाद किसी मृत व्यक्ति के नाम पर आय कर रिटर्न दाखिल करने के कानूनी परिणाम हो सकते हैं, लेकिन ऐसा करने से आय कर विभाग के अधिकारियों को अधिकार क्षेत्र नहीं मिल जाता और न ही ऐसा होने से पहले से अमान्य नोटिस वैध हो जाता है।
पीठ ने कहा कि अदालत न्यायिक व्याख्या के जरिए कानून की खामियों को नहीं भर सकतीं क्योंकि यह संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
भाषा सं. सलीम रंजन
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