उप्र के विधायक ने नागरिक दायित्व से जुड़ी लापरवाही के पीड़ितों को मुआवजा के लिए कानून की मांग की

उप्र के विधायक ने नागरिक दायित्व से जुड़ी लापरवाही के पीड़ितों को मुआवजा के लिए कानून की मांग की

उप्र के विधायक ने नागरिक दायित्व से जुड़ी लापरवाही के पीड़ितों को मुआवजा के लिए कानून की मांग की
Modified Date: September 19, 2026 / 06:23 pm IST
Published Date: September 19, 2026 6:23 pm IST

लखनऊ/नयी दिल्ली, 19 सितंबर (भाषा) उत्तर प्रदेश के विधायक राजेश्वर सिंह ने मांग की है कि जिस तरह ब्रिटिश काल के तीन आपराधिक कानूनों की जगह भारतीय कानून लाए गए, उसी तरह नागरिक दायित्व से जुड़ी लापरवाही के पीड़ितों को मुआवज़ा देने के लिए औपनिवेशिक काल के अपकृत्य कानून (लॉ ऑफ टॉर्ट्स) की जगह नया कानून बनाया जाए।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक और उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता राजेश्वर सिंह ने शनिवार को केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर उनसे व्यापक ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एंड कंपनसेशन कोड’ शुरू करने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि भारतीय विधि आयोग से सिफारिशें प्राप्त करने के बाद इसे कानून का रूप दिया जा सकता है।

उन्होंने पत्र में कहा है, ‘‘एक विकसित राष्ट्र को केवल दोषी को दंडित ही नहीं करना चाहिए, बल्कि पीड़ित व्यक्ति के जीवन को भी फिर से संवारना चाहिए।’’

लखनऊ की सरोजिनी नगर विधानसभा सीट से विधायक ने पत्र में लिखा है, ‘‘गलत कामों के लिए सजा देने वाले कानून को आधुनिक बनाने के बाद, मेरा मानना है कि अब उन नतीजों की भरपाई करने वाले कानून को भी आधुनिक बनाने का समय आ गया है। इसे कानूनविदों के बीच अपकृत्य कानून के नाम से जाना जाता है।’’

भारत ने 2024 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की जगह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य कानून की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) लागू किया।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पूर्व अधिकारी सिंह ने मेघवाल से इस मामले को समयबद्ध रिपोर्ट के लिए विधि आयोग के पास भेजने का आग्रह किया। उन्होंने इसके बाद विशेषज्ञ समिति द्वारा इसका विश्लेषण और सभी हितधारकों के साथ देशव्यापी परामर्श कराने का भी अनुरोध किया।

उन्होंने कहा, ‘‘भारत ने गलत कामों के लिए सजा देने वाले कानून को आधुनिक बनाया है। अब उन गलत कामों के परिणामों की भरपाई करने वाले कानून को भी आधुनिक बनाने का समय आ गया है। जहां नुकसान हुआ है, वहां न्याय का अर्थ केवल फैसला सुनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी भरपाई करना भी होना चाहिए।’’

सिंह ने तर्क दिया कि भारत में नागरिक दायित्व से जुड़े अलग-अलग कानून तो हैं, लेकिन कोई समग्र कानून नहीं है।

उन्होंने कहा कि 1988 का मोटर वाहन अधिनियम, 2019 का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और 1991 का लोक दायित्व बीमा अधिनियम जैसे कई अलग-अलग कानून हैं, लेकिन मौत से जुड़े दावों, डेटा उल्लंघन, साइबर धोखाधड़ी और बड़े हादसों के बढ़ते मामलों में जिस व्यापक और समग्र कानून की जरूरत है, उसका अभाव है। उन्होंने कहा कि यही वह ‘‘समग्र कानून’’ है, जिसकी कमी महसूस होती है।

सिंह ने लिखा है कि खुले नाले में गिरकर जान गंवाने वाले व्यक्ति की पत्नी, लापरवाहीपूर्ण इलाज से नुकसान उठाने वाले मरीज, कारखाने के अपशिष्ट से फसल नुकसान का सामना करने वाले किसान, बैंक की सुरक्षा में चूक के कारण ठगी का शिकार हुए पेंशनभोगी, ऑनलाइन ‘डीपफेक’ प्रसारित होने से प्रभावित हुई युवती या पुलिस की ज्यादती से नुकसान उठाने वाले व्यक्ति के परिवार को पांच स्पष्ट सवालों के जवाब चाहिए।

उन्होंने लिखा कि ये पांच सवाल हैं—दावा किसके खिलाफ किया जाए, किस मंच पर किया जाए, कितने समय के भीतर किया जाए, कितनी राशि के लिए किया जाए और मामले के फैसले तक अंतरिम सहायता के तौर पर क्या उपलब्ध है।

सिंह ने लिखा, ‘‘नागरिकों के लिए नागरिक क्षति संहिता (सिविल रॉन्ग्स कोड) केवल एक उपाय नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक सुधार का भी एक प्रभावी साधन है। जब किसी विभाग को पता होता है कि लापरवाही की एक कीमत चुकानी होगी, तो वह उसे रोकने के लिए कदम उठाना शुरू कर देता है। यह संहिता जवाबदेही को भी मजबूत करेगी।’’

भाषा आशीष संतोष

संतोष


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