Mera Paudha Mera Jeevan Campaign: आर्यम फाउंडेशन की पहल, ‘मेरा पौधा, मेरा जीवन’ अभियान से बदल रही तस्वीर, पर्यावरण संरक्षण का बना केंद्र

Ads

Mera Paudha Mera Jeevan Campaign: आर्यम फाउंडेशन की पहल, 'मेरा पौधा, मेरा जीवन' अभियान से बदल रही तस्वीर, पर्यावरण संरक्षण का बना केंद्र

  •  
  • Publish Date - June 5, 2026 / 02:07 PM IST,
    Updated On - June 5, 2026 / 02:08 PM IST

Mera Paudha Mera Jeevan Campaign | Photo Credit: IBC24

HIGHLIGHTS
  • आर्यम फाउंडेशन का अभियान
  • ‘मेरा पौधा, मेरा जीवन, मेरे संग’ के तहत वृक्षारोपण

मसूरी: Mera Paudha Mera Jeevan Campaign हिंदू धर्म में प्रकृति को ईश्वर का साक्षात स्वरूप माना गया है और इसे पूजनीय स्थान प्राप्त है। पंचतत्वों में शामिक पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को पंचमहाभूत कहा जाता है और इन्हें ईश्वरीय माना जाता है। इसी तरह वृक्ष सेवा और जीव पूजा के रूप में वट, पीपल, और तुलसी जैसे पौधों और गाय, सर्प व हाथी जैसे जीवों को धार्मिक महत्व देकर संरक्षित किया जाता है। अथर्ववेद में स्पष्ट कहा गया है कि “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात पृथ्वी माता है और हम उसकी संतान हैं।

Aryam International Foundation इसी तरह बौद्ध धर्म मानता है कि सभी जीव-जंतु और मनुष्य परस्पर जुड़े हुए हैं। भगवान बुद्ध का जीवन प्रकृति से जुड़ा था (जैसे बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति)। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना कर्म के सिद्धांत के अनुसार अनुचित माना गया है। वहीं जैन धर्म में ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का सिद्धांत किसी भी जीव को चोट न पहुँचाने की शिक्षा देता है, जो पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका है । गुरु ग्रंथ साहिब में ‘पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु’ (हवा गुरु है, पानी पिता है और धरती माता है) के माध्यम से प्रकृति और मनुष्य के अटूट रिश्ते को दर्शाया गया है। धार्मिक आस्था के कारण लोग सदियों से अनजाने में ही पर्यावरण का संरक्षण करते आ रहे हैं। पवित्र उपवन और पवित्र नदियों में कचरा न डालना और त्योहारों पर प्रकृति की पूजा इसी का हिस्सा हैं।

यूं तो इस अवसर पर पूरे देश में पौधरोपण और प्रकृति संरक्षण को समर्पित कई अभियान चलाए जाते हैं लेकिन उत्तराखंड के मसूरी में आर्यम इंटरनेशनल फाउंडेशन (Aryam International Foundation) का अभियान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। प्रो. पुष्पेंद्र कुमार आर्यम जी (Pushpendra Kumar Aryam) की अगुवाई में फ़ाउंडेशन के तत्त्वावधान में संचालित भगवान शंकर आश्रम द्वारा आनंद वाटिका प्रकल्प के अंतर्गत हस्त अहोरात्र नक्षत्र की दशमी तिथि गंगा दशहरा और विश्व पर्यावरण दिवस के शुभ अवसर पर ‘मेरा पौधा, मेरा जीवन, मेरे संग’ अभियान (Mera Paudha Mera Jeevan Campaign) चलाया जाता है। जिसके तहत अब तक लाखों वृक्ष लगाए जा चुके हैं। आर्यम जी महाराज को उनके पर्यावरण और प्रकृति प्रेम को देखते हुए ‘ग्रीन गुरु’ के रूप में जाना जाता है।

फाउंडेशन द्वारा पिछल 10 साल से जारी इस अभियान का उद्देश्य है – बढ़ती गर्मी और ग्लोबल वार्मिंग के बीच केवल वृक्षारोपण ही हमारे और पृथ्वी के स्वास्थ को संतुलित रख सकते हैं। बाढ़, सूखा, प्रदूषण और अन्य प्राकृतिक घटनाओं की वजह वृक्षों की कटाई ही है। आर्यम जी कहते हैं कि जो व्यक्ति पेड़-पौधों के साथ है, उनकी सेवा में रत है और प्रकृति में ईश्वरीय ऊर्जा की झलक देखता है वो दीर्घजीवी ही नहीं बल्कि सचेत मनुष्य के रूप में स्थापित होता है। इस तरह पौधरोपण सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि समूची पृथ्वी और प्रकृति के संरक्षण से जुड़ा संकल्प है।

आज आर्यम जी के सानिध्य में आनंद वाटिका प्रकल्प, इसी विचार को व्यावहारिक जीवन में उतारने की कोशिश है। स्वयं आश्रम के क्षेत्र में आज पंद्रह हज़ार से अधिक वृक्ष लहलहा रहे हैं और इन्हें छह वर्गों में बाँटा जा सकता है – ज्योतिषीय, नक्षत्रीय, आध्यात्मिक, आयुर्वेदिक, भौगोलिक और सजावटी। प्रमुख ज्योतिषीय, नक्षत्रीय, और आध्यात्मिक पौधों में चीड़, शीशम, पीपल, बरगद, शम्मी, मदार, आम, गूलर, रुद्राक्ष, कपूर, टिमरू, बाँझ, जैकरंडा, तोता, सत्यानाशी, धतूरा, पारिजात, सहदेवी, गरुड़, विष्णु कमल, लक्ष्मी कमल, सामान्य कमल इत्यादि मौजूद हैं। वहीं आयुर्वादिक में इलाइची, लेमनग्रास, ओलिव, तेजपत्ता, आमला, लौंग, दालचीनी, हल्दी, वैजयंती, अलोवेरा, रीठा, सिकाकाई ,केला, बिच्छू बूटी, इत्यादि हैं। भौगोलिक में बाँझ, टिमरू, बुरांश, देवदार, चीड़, किन्नौर, साइप्रस इत्यादि हैं। फल प्रदायक में जामुन, माल्टा, अखरोट, बादाम, आडू ,अंजीर,खुमानी,पल्म, संतरा,नारंगी,जमोया इत्यादि वृक्ष मौजूद हैं। अंत में सजावटी पौधों में बिगोनिया, गुड़हल, सिलवासा, मधुमालती, बाँस, फ़्यूशिया, गुलाब, झाड़ गुलाब, इत्र गुलाब, लिली, लोटा बाँस, बॉटल ब्रश, मोगरा इत्यादि हैं।

समस्त उत्तराखंड में केवल भगवान शंकर आश्रम में ही रक्त और श्वेत वर्णी ब्रह्मकमल खिलते हैं। ब्रह्मकमल का मसूरी की घाटी में उगना स्वयं में अद्वितीय है क्योंकि जो तापमान और वातावरण इन्हें चाहिए वह केवल हिमालय पर्वत की ऊँची कंदराओं में ही संभव है । पेड़ पौधों को केवल पानी, खाद-मिट्टी, और धूप ही नहीं बल्कि भाव भी चाहिए होता है। ब्रह्मकमल उन पौधों में से एक है जिसमें स्वयं परमात्मा का वास है। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मकमल को खिलता देख आप जो भी मनोकामना माँगते हैं उस पर माँ पार्वती की विशेष कृपा होती है। फूलों को परमात्मा को अर्पित किया जाता है किंतु ब्रह्मकमल स्वयं पूजनीय है।

इन्हें भी पढ़ें:-

आर्यम इंटरनेशनल फाउंडेशन का अभियान क्या है?

‘मेरा पौधा, मेरा जीवन, मेरे संग’ अभियान, जिसके तहत लाखों वृक्ष लगाए गए हैं।

आर्यम जी को ग्रीन गुरु क्यों कहा जाता है?

उनके पर्यावरण प्रेम और वृक्षारोपण के संकल्प के कारण।

आनंद वाटिका प्रकल्प में कितने वृक्ष हैं?

15,000 से अधिक वृक्ष, जिन्हें छह वर्गों में बाँटा गया है।