अफ्रीकी नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग की

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अफ्रीकी नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग की

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  • Publish Date - September 24, 2026 / 09:30 PM IST,
    Updated On - September 24, 2026 / 09:30 PM IST

जोहान्सबर्ग, 24 सितंबर (एपी) अफ्रीकी नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करते हुए अपने महाद्वीप का स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं होने पर चिंता जताई है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंगलवार को शुरू हुए सत्र को संबोधित करने वाले कई अफ्रीकी राष्ट्राध्यक्षों ने सुरक्षा परिषद में अफ्रीकी महाद्वीप के स्थायी प्रतिनिधित्व की कमी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अफ्रीका वैश्विक सुरक्षा मुद्दों से निपट रहा है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उसकी आबादी और सरकारों को प्रभावित करते हैं।

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध, इजराइल-हमास संघर्ष और हाल में अमेरिका का ईरान के साथ युद्ध समेत कई मुद्दे इस साल की महासभा में प्रमुख रूप से छाए हुए हैं।

पंद्रह सदस्यीय सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन हैं, जिनके पास वीटो शक्ति है।

अन्य देशों, जिनके पास वीटो ताकत नहीं है, का चुनाव महासभा करती है और इन्हें क्रमबद्ध तरीके से हर दो साल में सुरक्षा परिषद में शामिल किया जाता है। अफ्रीका के पास इन अस्थायी सीट में से तीन सीट हैं।

ज्यादातर अफ्रीकी नेताओं के अनुसार, सुरक्षा परिषद में असमान प्रतिनिधित्व ने इस संगठन की विश्वसनीयता और राष्ट्रों के बीच बहुपक्षवाद तथा समानता के उसके बार-बार दोहराए जाने वाले संकल्प पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो ने बुधवार को प्रतिनिधियों से कहा, ‘‘संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत हर राष्ट्र संप्रभु और समान है। फिर भी, युद्ध और शांति के सबसे गंभीर सवाल पर पांच देशों के पास स्थायी शक्ति है, जो अन्य 188 देशों के पास नहीं है। इस महासभा में घोषित समानता सुरक्षा परिषद के दरवाजे पर जाकर समाप्त हो जाती है।’’

इथियोपिया के राष्ट्रपति तये अत्सके सेलासी ने पूछा, ‘‘विश्व 1.6 अरब अफ्रीकियों को समान प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित किए जाने को कैसे उचित ठहरा सकता है?’’

बोत्सवाना के राष्ट्रपति ड्यूमा बोको उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने अफ्रीकी देशों को इन चर्चाओं में शामिल किए जाने की मांग की।

बोको ने कहा, ‘‘विकासशील देशों की इन प्रौद्योगिकियों के लिए मानक और सुरक्षा उपाय तय करने में सार्थक भागीदारी होनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे अवसरों का विस्तार करें, सम्मानजनक रोजगार को बढ़ावा दें और सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत करें, साथ ही मानव गरिमा और अधिकारों की रक्षा भी करें।’’

एपी

देवेंद्र अविनाश

अविनाश