पाकिस्तान के पंजाब में भगत सिंह की 119वीं जयंती मनाई गई
पाकिस्तान के पंजाब में भगत सिंह की 119वीं जयंती मनाई गई
(एम जुल्करनैन)
लाहौर, 28 सितंबर (भाषा) पाकिस्तान के पंजाब में ‘शहीद-ए-आजम’ भगत सिंह की 119वीं जयंती के अवसर पर सोमवार को एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन पाकिस्तान ने लाहौर उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के डेमोक्रेटिक लॉन में केक काटने का कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें वकीलों, नागरिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों और क्रांतिकारी नेता के प्रशंसकों ने हिस्सा लिया।
इस अवसर पर फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज राशिद कुरैशी ने कहा कि भगत सिंह का संघर्ष उपमहाद्वीप के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय था और उनका साहस, राजनीतिक जागरूकता तथा बलिदान युवा पीढ़ियों के लिए आज भी प्रासंगिक है।
कुरैशी ने कहा, ‘‘भगत सिंह केवल किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय के इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वह उपमहाद्वीप की साझा ऐतिहासिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।’’
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय ऐतिहासिक स्थलों, दस्तावेजों, न्यायिक अभिलेखों और राष्ट्रीय विरासत के अन्य माध्यमों के जरिए युवा पीढ़ियों को इससे परिचित कराने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि भगत सिंह के जीवन, मुकदमे और फांसी के मामले में लाहौर का विशेष ऐतिहासिक महत्व है, जिससे यह उनकी विरासत को याद करने के लिए उपयुक्त स्थान बन जाता है।
प्रतिभागियों ने भगत सिंह के मुकदमे और लाहौर से जुड़े उनके जीवन के अन्य पहलुओं से संबंधित दस्तावेजों के संरक्षण का आह्वान किया और आग्रह किया कि इस सामग्री को शोध एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए उपलब्ध कराया जाए।
सभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव भी पारित किया गया, जिसमें पाकिस्तान सरकार से भगत सिंह के ऐतिहासिक संघर्ष और बलिदान के सम्मान में उन्हें ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ से सम्मानित करने पर विचार करने का आग्रह किया गया।
प्रस्ताव में भारत सरकार से भी भगत सिंह को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने पर विचार करने का आग्रह किया गया।
प्रस्ताव के अनुसार, भगत सिंह की विरासत को मान्यता देने से पाकिस्तान और भारत के लोगों की साझा ऐतिहासिक विरासत के साथ-साथ शांति, आपसी सम्मान, सांस्कृतिक संबंधों और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है।
प्रतिभागियों ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तथा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जान गंवाने वाले अन्य लोगों को श्रद्धांजलि दी।
ब्रिटिश शासन के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में मुकदमे के बाद ब्रिटिश शासकों ने भगत सिंह को उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च, 1931 को फांसी दे दी थी।
भाषा तान्या दिलीप
दिलीप

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